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Rigveda / 10 / 17 / 12

यस्ते॑ द्र॒प्सः स्कन्द॑ति॒ यस्ते॑ अं॒शुर्बा॒हुच्यु॑तो धि॒षणा॑या उ॒पस्था॑त् । अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ परि॑ वा॒ यः प॒वित्रा॒त्तं ते॑ जुहोमि॒ मन॑सा॒ वष॑ट्कृतम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 17 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : देवश्रवा यामायनः | देवता : आपः सोमो वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । ते॒ । द्र॒प्सः । स्कन्द॑ति । यः । ते॒ । अं॒शुः । बा॒हुऽच्यु॑तः । धि॒षणा॑याः । उ॒पऽस्था॑त् । अ॒ध्व॒र्योः । वा॒ । परि॑ । वा॒ । यः । प॒वित्रा॑त् । तम् । ते॒ । जु॒हो॒मि॒ । मन॑सा । वष॑ट्ऽकृतम् ॥ १०.१७.१२

पदार्थ : (ते) हे परमात्मन् ! तेरा (द्रप्सः) रस (स्कन्दति) पृथिवी पर प्राप्त होता है (ते) तेरा (यः अंशुः) वाष्परूप (बाहुच्युतः) बलवीर्यद्वारा प्राप्त (धिषणायाः उपस्थात्) वाणी के स्थान से (अध्वर्योः) द्युलोक से परे (यः पवित्रात्-वा) और जो अन्तरिक्ष से परे (ते-तं वषट्कृतम्) तेरे उस वज्रघोषकृत या क्रिया से निष्पादित शिल्पविद्याजन्य को (मनसा जुहोमि) मन से विचार करता हूँ-मन में धारण करता हूँ ॥१२॥

भावार्थ : परमात्मा का रचा सूर्य या रसरूप जलांशु अन्तरिक्ष के माध्यम से पृथिवी पर प्राप्त होता है, उस सूर्य या जल का मन से विचार करके अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए ॥१२॥