Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 25 / 4

समु॒ प्र य॑न्ति धी॒तय॒: सर्गा॑सोऽव॒ताँ इ॑व । क्रतुं॑ नः सोम जी॒वसे॒ वि वो॒ मदे॑ धा॒रया॑ चम॒साँ इ॑व॒ विव॑क्षसे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 25 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : सोमः | छन्द : निचृदार्षीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : सम् । ऊँ॒ इति॑ । प्र । य॒न्ति॒ । धी॒तयः॑ । सर्गा॑सः । अ॒व॒तान्ऽइ॑व । क्रतु॑म् । नः॒ । सो॒म॒ । जी॒वसे॑ । वि । वः॒ । मदे॑ । धा॒रय॑ । च॒म॒सान्ऽइ॑व । विव॑क्षसे ॥ १०.२५.४

पदार्थ : (सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन् ! (क्रतुम्) तुझ कार्यसाधक को (धीतयः) प्रज्ञाएँ तथा कर्म-प्रवृत्तियाँ (उ) निरन्तरम् (सं प्र यन्ति) सम्यक् प्राप्त होती हैं (सर्गासः-अवतान्-इव) उदक-प्रवाह जैसे निम्न प्रदेशों को प्राप्त होते हैं (नः जीवसे) हमारे जीवन के लिये (चमसान्-इव धारय) अपने आनन्द रस के पात्रभूत हम उपासकों को धारण कर, स्वीकार कर (वः मदे वि) तेरे हर्षनिमित्त शरण में हम विशेषरूप से रहें, (विवक्षसे) तू महान् है ॥४॥

भावार्थ : उपासकों की प्रज्ञाएँ और कर्मप्रवृत्तियाँ परमात्मा की ओर ऐसे झुकी रहती हैं, जैसे जलप्रवाह निम्न स्थान की ओर झुके रहते हैं। वह हमारे जीवन के लिये हमें अपने आनन्दरसों का पात्र बनाता है। हमें उसकी शरण में रहना चाहिये ॥४॥