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Rigveda / 10 / 26 / 4

मं॒सी॒महि॑ त्वा व॒यम॒स्माकं॑ देव पूषन् । म॒ती॒नां च॒ साध॑नं॒ विप्रा॑णां चाध॒वम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 26 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : पूषा | छन्द : निचृदार्ष्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : मं॒सी॒महि॑ । त्वा॒ । व॒यम् । अ॒स्माक॑म् । दे॒व॒ । पू॒ष॒न् । म॒ती॒नाम् । च॒ । साध॑नम् । विप्रा॑णाम् । च । आ॒ऽध॒वम् ॥ १०.२६.४

पदार्थ : (पूषन् देव) हे पोषणकर्त्ता परमात्मदेव ! (अस्माकं मतीनां च) हम तेरे अस्तित्व को माननेवालों के (साधनम्) ज्ञान एवं सुखसम्पन्न करानेवाले (विप्राणां च) और स्तुतियों के द्वारा तुझे प्रसन्न करनेवालों के (आधवम्) भली-भाँति आगे ले जानेवाले अथवा पाप कर्म से शोधनेवाले तुझको (मंसीमहि) मानते हैं-पूजते हैं ॥४॥

भावार्थ : उसके अस्तित्व माननेवाले, उस उत्पन्न पथ पर ले जानेवाले पापशासक परमात्मा को उपासक जन स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करते हैं-अनुकूल बनाते हैं ॥४॥