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Rigveda / 10 / 27 / 2

यदीद॒हं यु॒धये॑ सं॒नया॒न्यदे॑वयून्त॒न्वा॒३॒॑ शूशु॑जानान् । अ॒मा ते॒ तुम्रं॑ वृष॒भं प॑चानि ती॒व्रं सु॒तं प॑ञ्चद॒शं नि षि॑ञ्चम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यदि॑ । इत् । अ॒हम् । यु॒धये॑ । स॒म्ऽनया॑नि । अदे॑वऽयून् । त॒न्वा॑ । शूशु॑जानान् । अ॒मा । ते॒ । तुम्र॑म् । वृ॒ष॒भम् । प॒चा॒नि॒ । ती॒व्रम् । सु॒तम् । प॒ञ्च॒ऽद॒शम् । नि । सि॒ञ्च॒म् ॥ १०.२७.२

पदार्थ : (ते-अमा) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! तेरी सहायता से (यदि-इत्-अहं युधये) यदि तो मैं उपासक युद्ध के लिये उद्यत हो जाऊँ (तन्वा शूशुजानान्) शरीर से जाज्वल्यमान क्रोधित हुए (अदेवयून्) जो तुझे अपना इष्टदेव नहीं मानते, उन ऐसे नास्तिकों को (सम्-नयानि) सम्यक् प्रभावित करता हूँ-तेरे उपासक आस्तिक बनाता हूँ। (तुम्रं वृषभं पचानि) घोर घातक वृषभ समान पाप को खा जाता हूँ-नष्ट करता हूँ (तीव्रं सुतम्-पञ्चदशं नि षिञ्चम्) प्रबल सिद्ध ओज को अपने मन में आत्मा में पूर्ण धारण करता हूँ ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की सहायता से उपासक जन बड़े क्रोधी और नास्तिक जनों के साथ आत्मशक्ति से युद्ध करके उनको परमात्मा के उपासक-आस्तिक बनाते हैं और अपने अन्दर के प्रबल पापों को समाप्त करते हैं तथा निज मन और आत्मा में ओज-आत्मिक तेज को धारण करते हैं ॥२॥