Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 179 / 3

न मृषा॑ श्रा॒न्तं यदव॑न्ति दे॒वा विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ अ॒भ्य॑श्नवाव। जया॒वेदत्र॑ श॒तनी॑थमा॒जिं यत्स॒म्यञ्चा॑ मिथु॒नाव॒भ्यजा॑व ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 179 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : लोपमुद्राऽगस्त्यौ | देवता : दम्पती | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब गृहाश्रम व्यवहार में स्त्री-पुरुष के व्यवहार को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : न। मृषा॑। श्रा॒न्तम्। यत्। अव॑न्ति। दे॒वाः। विश्वाः॑। इत्। स्पृधः॑। अ॒भि। अ॒श्न॒वा॒व॒। जया॑व। इत्। अत्र॑। श॒तऽनी॑थम्। आ॒जिम्। यत्। स॒म्यञ्चा॑। मि॒थु॒नौ। अ॒भि। अजा॑व ॥ १.१७९.३

पदार्थ : (देवाः) विद्वान् जन (यत्) जिस कारण (अत्र) इस जगत् में (मृषा) मिथ्या (श्रान्तम्) खेद करते हुए की (न) नहीं (अवन्ति) रक्षा करते हैं इससे हम (विश्वा, इत्) सभी (स्पृधः) संग्रामों को (अभि, अश्नवाव) सम्मुख होकर (यत्) जिस कारण गृहाश्रम को (सम्यञ्चा) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हुए (मिथुनौ) स्त्री-पुरुष हम दोनों (अभ्यजाव) सब ओर से उसके व्यवहारों को प्राप्त होवें इससे (शतनीथम्) जो सैकड़ों से प्राप्त होने योग्य (आजिम्) संग्राम को (जयावेत्) जीतते ही हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : जिस कारण आप विद्वान् जन मिथ्याचारी मूढ़ विद्यार्थी जनों को नहीं पढ़ाते हैं, इससे स्त्रीपुरुष मिथ्या आचार व्यभिचारादि दोषों को त्यागें और जैसे गृहाश्रम का उत्कर्ष हो वैसे स्त्रीपुरुष परस्पर धर्म के आचरण करनेवाले हों ॥ ३ ॥