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Rigveda / 10 / 27 / 11

यस्या॑न॒क्षा दु॑हि॒ता जात्वास॒ कस्तां वि॒द्वाँ अ॒भि म॑न्याते अ॒न्धाम् । क॒त॒रो मे॒निं प्रति॒ तं मु॑चाते॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ य ईं॑ वा वरे॒यात् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यस्य॑ । अ॒न॒क्षा । दु॒हि॒ता । जातु॑ । आस॑ । कः । ताम् । वि॒द्वान् । अ॒भि । म॒न्या॒ते॒ । अ॒न्धाम् । क॒त॒रः । मे॒निम् । प्रति॑ । तम् । मु॒चा॒ते॒ । यः । ई॒म् । वहा॑ते । यः । ई॒म् । वा॒ । व॒रे॒ऽयात् ॥ १०.२७.११

पदार्थ : (यस्य-अनक्षा दुहिता) जिसके आश्रय नेत्र-हीन दर्शनशक्तिहीन-ज्ञान-शून्य जीवमात्र के लिये भाँति-भाँति के भोगों को दोहनेवाली प्रकृति (जातु-आस) किसी समय अर्थात् प्रलयकाल में वर्तमान थी (ताम्-अन्धां कः-विद्वान्-अभि मन्याते) उस अन्धी जैसी प्रकृति को कौन सर्वथा जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता। (कतरः-तं मेनिं प्रति मुचाते) कौन ही उस वज्र जैसी प्रकृति से मुक्त होवे (यः-ईं वहति) जो इसको वहन-सहन करने में समर्थ होता है (यः-ईं वा वरेयात्) जो इसे स्वाधीन रखे-रखने में समर्थ हो ॥११॥

भावार्थ : ज्ञान-शून्य प्रकृति जीवमात्र के लिये विविध भोगों का दोहन करती है। जो प्रलयकाल में अपने रूप में रहती है, उसे कोई विद्वान् स्वरूपतः ठीक-ठीक नहीं जान सकता और न उससे मुक्त हो सकता है। उसके बन्धन में प्रत्येक जीव रहता है, परन्तु जो उसको ठीक सहन करने में समर्थ होता है, वह ही उससे मुक्त हो सकता है ॥११॥