Rigveda / 10 / 27 / 21
अ॒यं यो वज्र॑: पुरु॒धा विवृ॑त्तो॒ऽवः सूर्य॑स्य बृह॒तः पुरी॑षात् । श्रव॒ इदे॒ना प॒रो अ॒न्यद॑स्ति॒ तद॑व्य॒थी ज॑रि॒माण॑स्तरन्ति ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 21
In English:
Seer : vasukra aindraH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aya.m yo vajraH purudhaa vivRRitto.avaH suuryasya bRRihataH puriiShaat . shrava idenaa paro anyadasti tadavyathii jarimaaNastaranti .
Component Words : ayam . yaH . vajraH . purudhaa . vi.avRRittaH . avaH . suuryasya . bRRihataH . puriiShaat . shravaH . it . enaa . paraH . anyat . asti . tat . avyathii . jarimaaNaH . taranti . 10.27.21
In Hindi:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : अ॒यम् । यः । वज्रः॑ । पु॒रु॒धा । विऽवृ॑त्तः । अ॒वः । सूर्य॑स्य । बृ॒ह॒तः । पुरी॑षात् । श्रवः॑ । इत् । ए॒ना । प॒रः । अ॒न्यत् । अ॒स्ति॒ । तत् । अ॒व्य॒थी । ज॒रि॒माणः॑ । त॒र॒न्ति॒ ॥ १०.२७.२१
पदार्थ : (यः-अयं वज्रः पुरुधा विवृत्तः) जो यह दु:खों से छुड़ानेवाला जीवन-प्राण सब जीवों में विशेषरूप से रहता है। (सूर्यस्य बृहतः पुरीषात्) सूर्यसदृश जगत्प्रकाशक परमात्मा के महान् पालनधर्म से (अवः) अवर मार्ग से-संसारमार्ग से हमें प्राप्त हुआ (इत्) और (एना परः-अन्यत्-श्रवः-अस्ति) इस संसारमार्ग से परे अन्य श्रवणीय मोक्ष जीवन है (तत्) उस मोक्ष जीवन को (अव्यथी जरिमाणः-तरन्ति) संसार में अबाध्यमान-दोषरहित स्तुति करनेवाले उपासक प्राप्त करते हैं ॥२१॥
भावार्थ : दुःखों से बचानेवाला जीवों के अन्दर जीवनप्राण होता है। सूर्य के समान जगत्प्रकाशक परमात्मा की कृपा से यह प्राप्त होता है। इससे ऊँचा मोक्ष जीवन है, जिसको दोषरहित स्तुति करनेवाले उपासक प्राप्त किया करते हैं ॥२१॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : अ॒यम् । यः । वज्रः॑ । पु॒रु॒धा । विऽवृ॑त्तः । अ॒वः । सूर्य॑स्य । बृ॒ह॒तः । पुरी॑षात् । श्रवः॑ । इत् । ए॒ना । प॒रः । अ॒न्यत् । अ॒स्ति॒ । तत् । अ॒व्य॒थी । ज॒रि॒माणः॑ । त॒र॒न्ति॒ ॥ १०.२७.२१
भावार्थ :