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Rigveda / 1 / 179 / 5

इ॒मं नु सोम॒मन्ति॑तो हृ॒त्सु पी॒तमुप॑ ब्रुवे। यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळतु पुलु॒कामो॒ हि मर्त्य॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 179 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : लोपमुद्राऽगस्त्यौ | देवता : दम्पती | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब प्रकृत विषय में महौषधियों के सारसंग्रह को कहा है ।

पदपाठ : इ॒मम्। नु। सोम॑म्। अन्ति॑तः। हृ॒त्ऽसु। पी॒तम्। उप॑। ब्रु॒वे॒। यत्। सी॒म्। आगः॑। च॒कृ॒म। तत्। सु। मृ॒ळ॒तु॒। पु॒लु॒ऽकामः॑। हि। मर्त्यः॑ ॥ १.१७९.५

पदार्थ : मैं (यत्) जिस (इमम्) इस (हृत्सु) हृदयों में (पीतम्) पिये हुए (सोमम्) ओषधियों के रस के (उप, ब्रुवे) उपदेशपूर्वक कहता हूँ उसको (पुलुकामः) बहुत कामनावाला (मर्त्यः) पुरुष (हि) ही (सुमृलतु) सुखसंयुक्त करे अर्थात् अपने सुख में उसका संयोग करे। जिस (आगः) अपराध को हम लोग (चकृम) करें (तत्) उसको (नु) शीघ्र (सीम्) सब ओर से (अन्तिमः) समीप से सभी जन छोड़ें अर्थात् क्षमा करें ॥ ५ ॥

भावार्थ : जो महौषधियों के रस को पीते हैं, वे रोगरहित बलिष्ठ होते हैं, जो कुपथ्याचरण करते हैं, वे रोगों से पीड्यमान होते हैं ॥ ५ ॥