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Rigveda / 10 / 29 / 8

व्या॑न॒ळिन्द्र॒: पृत॑ना॒: स्वोजा॒ आस्मै॑ यतन्ते स॒ख्याय॑ पू॒र्वीः । आ स्मा॒ रथं॒ न पृत॑नासु तिष्ठ॒ यं भ॒द्रया॑ सुम॒त्या चो॒दया॑से ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 29 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वसुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : वि । आ॒न॒ट् । इन्द्रः॑ । पृत॑नाः । सु॒ऽओजाः॑ । आ । अ॒स्मै॒ । य॒त॒न्ते॒ । स॒ख्याय॑ । पू॒र्वीः । आ । स्म॒ । रथ॑म् । न । पृत॑नासु । ति॒ष्ठ॒ । यम् । भ॒द्रया॑ । सु॒ऽम॒त्या । चो॒दया॑से ॥ १०.२९.८

पदार्थ : (स्वोजाः-इन्द्रः) सुन्दर तेजवाला ऐश्वर्यवान् परमात्मा (पृतनाः-व्यानट्) मनुष्यों को-मनुष्यों के अन्तःकरणों में व्याप्त है (पूर्वीः-अस्य सख्याय आ यतन्ते) श्रेष्ठ प्रजाएँ-उपासक जन इस परमात्मा के मित्रभाव के लिये भली-भाँति चाहना करते हैं (पृतनासु रथं न स्म-आ तिष्ठ) मनुष्यों के स्वकीय रमणयोग्य आनन्द को तत्काल भली-भाँति स्थापित कर (यं भद्रया सुमत्या चोदयासे) जिस रमणयोग्य आनन्द को भजनीय स्तुति द्वारा-भजनीय स्तुति को लक्ष्य करके मनुष्यों के अन्दर तू प्रेरित करता है ॥८॥

भावार्थ : ओजस्वी तथा ऐश्वर्यवान् परमात्मा मनुष्यों के अन्तःकरणों में व्याप्त रहता है। उपासक जन मित्रभाव के लिए उसे अपनाना चाहते हैं। उनके अन्दर परमात्मा अपने आनन्दरस को स्तुतियों द्वारा प्रेरित किया करता है ॥८॥