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Rigveda / 10 / 30 / 3

अध्व॑र्यवो॒ऽप इ॑ता समु॒द्रम॒पां नपा॑तं ह॒विषा॑ यजध्वम् । स वो॑ दददू॒र्मिम॒द्या सुपू॑तं॒ तस्मै॒ सोमं॒ मधु॑मन्तं सुनोत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 30 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : आप अपान्नपाद्वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अध्व॑र्यवः । अ॒पः । इ॒त॒ । स॒मु॒द्रम् । अ॒पाम् । नपा॑तम् । ह॒विषा॑ । य॒ज॒ध्व॒म् । सः । वः॒ । द॒द॒त् । ऊ॒र्मिम् । अ॒द्य । सुऽपू॑तम् । तस्मै॑ । सोम॑म् । मधु॑ऽमन्तम् । सु॒नो॒त॒ ॥ १०.३०.३

पदार्थ : (अध्वर्यवः) हे राजसूय यज्ञ के ऋत्विजों ! तुम (अपः-इत) प्रजाजनों को प्राप्त होओ तथा (अपां नपातं समुद्रं हविषा यजध्वम्) प्रजाजनों के न गिरानेवाले अर्थात् पूर्ण रक्षक समुद्रसमान गम्भीर राजा को उपहार और आशीर्वाद देने द्वारा समागम में प्रेरित करो (सः) वह राजा (वः) तुम्हारे लिये (अद्य-ऊर्मिम्-ददत्) इस राजसूय अवसर पर प्रजाओं से प्राप्त उपहार में से दातव्यभाग देवे-देगा, अतः (तस्मै सुपूतं मधुमन्तं सोमं सुनोत) उसके लिये शुद्ध मधुररस युक्त सोम को राजसूय में निकालो या राज्यैश्वर्य को विधान द्वारा सिद्ध करो ॥३॥

भावार्थ : राजसूययज्ञ में ऋत्विक् लोग प्रजाजनों का राजा के साथ उपहार द्वारा परिचय समागम करावें। प्रजाओं द्वारा प्राप्त उपहार में से राजा ऋत्विजों को भी प्रदान कर उसका सत्कार करे ॥३॥