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Rigveda / 10 / 30 / 10

आ॒वर्वृ॑तती॒रध॒ नु द्वि॒धारा॑ गोषु॒युधो॒ न नि॑य॒वं चर॑न्तीः । ऋषे॒ जनि॑त्री॒र्भुव॑नस्य॒ पत्नी॑र॒पो व॑न्दस्व स॒वृध॒: सयो॑नीः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 30 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : आप अपान्नपाद्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आ॒ऽवर्वृ॑ततीः । अध॑ । नु । द्वि॒ऽधाराः॑ । गो॒षु॒ऽयुधः॑ । न । नि॒ऽय॒वम् । चर॑न्तीः । ऋषे॑ । जनि॑त्रीः । भुव॑नस्य । पत्नीः॑ । अ॒पः । व॒न्द॒स्व॒ । स॒ऽवृधः॑ । सऽयो॑नीः ॥ १०.३०.१०

पदार्थ : (ऋषे) हे विद्वान् पुरोहित ! (अध नु) और फिर (भुवनस्य जनित्रीः पत्नीः) राजसूययज्ञ के सम्पादन करनेवाली तथा रक्षण करनेवाली (सवृधः सयोनीः-अपः) राजा के साथ राष्ट्रवृद्धिकर्म में प्रवृत्त हुई समान देशवाली प्रजाओं को (वन्दस्व) प्रशंसित कर-सम्मानित कर, क्योंकि (न) अब (द्विधाराः-नु-आवर्वृततीः) दो वाणीवाली अर्थात् राजा के लिये कल्याणवाली निजहितार्थ प्रार्थना वाणीवाली तथा राजसूययज्ञ में भलीभाँति प्रवर्त्तमान (गोषुयुधः) राष्ट्रभूभागों में प्राप्त होनेवाली-बसनेवाली (नियवं चरन्तीः) नियतरूप से यथायोग्य अन्नों को सेवन करती हुई प्रजाओं को प्रशंसित कर-सम्मानित कर ॥१०॥

भावार्थ : राजसूययज्ञ में राजा के सत्कार के साथ-साथ पुरोहित जन उस देश के वासी तथा राष्ट्र को समृद्ध करनेवाली और नियमितरूप से संतोष के साथ अन्नादि भोग करनेवाली प्रजाओं का भी स्वागत करे ॥१०॥