Rigveda / 10 / 31 / 7
किं स्वि॒द्वनं॒ क उ॒ स वृ॒क्ष आ॑स॒ यतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी नि॑ष्टत॒क्षुः । सं॒त॒स्था॒ने अ॒जरे॑ इ॒तऊ॑ती॒ अहा॑नि पू॒र्वीरु॒षसो॑ जरन्त ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 31 | Mantra No : 7
In English:
Seer : kavaSha ailuuShaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ki.m svidvana.m ka u sa vRRikSha aasa yato dyaavaapRRithivii niShTatakShuH . sa.mtasthaane ajare itauutii ahaani puurviiruShaso jaranta .
Component Words : kim . svit . vanam . kaH . uu.N iti . saH . vRRikShaH . aasa . yataH . dyaavaapRRithivii iti . niH.atatakShuH . santasthaane iti sam.atasthaane . ajare iti . itauutii itiitaH.auutii . ahaani . puurviiH . uShasaH . jaranta . 10.31.7
In Hindi:
ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : किम् । स्वि॒त् । वन॑म् । कः । ऊँ॒ इति॑ । सः । वृ॒क्षः । आ॒स॒ । यतः॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । निः॒ऽत॒त॒क्षुः । स॒न्त॒स्था॒ने इति॑ स॒म्ऽत॒स्था॒ने । अ॒जरे॒ इति॑ । इ॒तऊ॑ती॒ इती॒तःऽऊ॑ती । अहा॑नि । पू॒र्वीः । उ॒षसः॑ । ज॒र॒न्त॒ ॥ १०.३१.७
पदार्थ : (किं स्वित्-वनम्) वह वन कौनसा है (कः-उ सः-वृक्षः-आस) और कौन वह वृक्ष है (यतः-द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः) जिससे कि द्युलोक और पृथ्वीलोक को रचा है। (सन्तस्थाने) जो कि सम्यक् संस्थित (अजरे) जरारहित (इत-ऊती) इस प्राणी लोक से सुरक्षित है (अहानि पूर्वीः-उषसः-जरन्त) जिससे मध्य में वर्त्तमान दिन-अहोरात्र और पूर्व से चली आई उषाएँ परम्परा से प्राप्त प्रातर्वेलाएँ जीर्ण हो जाती हैं ॥७॥
भावार्थ : परमात्मा ने अपने व्यापक तथा प्रकाशक स्वरूप से सृष्टि के प्रमुख द्युमण्डल और पृथ्वीमण्डल को रचा है और इसके बीच में दिन-रातों तथा प्रभातवेलाओं को प्रकट किया, जो अन्य प्राणी आदि वस्तुओं की जीर्णता के साथ जीर्णता को प्राप्त होती रहती हैं ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : किम् । स्वि॒त् । वन॑म् । कः । ऊँ॒ इति॑ । सः । वृ॒क्षः । आ॒स॒ । यतः॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । निः॒ऽत॒त॒क्षुः । स॒न्त॒स्था॒ने इति॑ स॒म्ऽत॒स्था॒ने । अ॒जरे॒ इति॑ । इ॒तऊ॑ती॒ इती॒तःऽऊ॑ती । अहा॑नि । पू॒र्वीः । उ॒षसः॑ । ज॒र॒न्त॒ ॥ १०.३१.७
भावार्थ :