Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 32 / 3

तदिन्मे॑ छन्त्स॒द्वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरं पु॒त्रो यज्जानं॑ पि॒त्रोर॒धीय॑ति । जा॒या पतिं॑ वहति व॒ग्नुना॑ सु॒मत्पुं॒स इद्भ॒द्रो व॑ह॒तुः परि॑ष्कृतः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 32 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूषः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : तत् । इत् । मे॒ । छ॒न्त्स॒त् । वपु॑षः । वपुः॑ऽतरम् । पु॒त्रः । यत् । जान॑म् । पि॒त्रोः । अ॒धि॒ऽइय॑ति । जा॒या । पति॑म् । व॒ह॒ति॒ । व॒नुना॑ । सु॒ऽमत् । पुं॒सः । इत् । भ॒द्रः । व॒ह॒तुः । परि॑ऽकृतः ॥ १०.३२.३

पदार्थ : (पित्रोः पुत्रः यत्-जानम्-अधि-इयति) माता-पिता का पुत्र जब जन्म धारण करता है, (तत्-इत्-मे-वपुषः-वपुष्टरं छन्त्सत्) उसी समय मुझ सुन्दर गृहस्थ से सुन्दर सुख परमात्मा मेरे लिये चाहे-प्राप्त कराये (वग्नुना जाया पतिं वहति) अतः उसकी स्तुतिवाणी से-उसकी कृपा से पत्नी मुझ पति को प्राप्त होती है (सुमत् पुंसः-इत्) उत्तम हर्षप्रद सुख पुरुष का भी प्राप्त होता है (भद्रः-वहतुः परिष्कृतः) गृहस्थ आश्रम यह भजनीय-प्रापणीय उत्तम परिणाम है ॥३॥

भावार्थ : पति-पत्नी का सम्बन्ध होना गृहस्थ आश्रम कहलाता है और वह सन्तान की उत्पत्ति के लिये है। वह उसका सच्चा सुख है। सुयोग्य पत्नी और सुयोग्य पति ईश्वर की कृपा से प्राप्त होते हैं। यही गृहस्थ का सुन्दर फल है ॥३॥