Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 34 / 1

प्रा॒वे॒पा मा॑ बृह॒तो मा॑दयन्ति प्रवाते॒जा इरि॑णे॒ वर्वृ॑तानाः । सोम॑स्येव मौजव॒तस्य॑ भ॒क्षो वि॒भीद॑को॒ जागृ॑वि॒र्मह्य॑मच्छान् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 34 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकृषिप्रशंसा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : इस सूक्त में द्यूत-जुआ खेलने के दुष्परिणाम दिखलाते हुए कृषि की प्रशंसा दिखलाई है।

पदपाठ : प्रा॒वे॒पाः । मा॒ । बृ॒ह॒तः । मा॒द॒य॒न्ति॒ । प्र॒वा॒ते॒ऽजाः । इरि॑णे । वर्वृ॑तानाः । सोम॑स्यऽइव । मौ॒ज॒ऽव॒तस्य॑ । भ॒क्षः । वि॒ऽभीद॑कः । जागृ॑विः । मह्य॑म् । अ॒च्छा॒न् ॥ १०.३४.१

पदार्थ : (बृहतः प्रावेपाः) महान् विभीदक वृक्ष के फल-अक्ष कम्पनशील या कम्पानेवाले हैं (प्रवातेजाः) निम्न स्थान पर्वत की उपत्यका में उत्पन्न हुए (इरिणे वर्वृतानाः) जलरहित ओषधिरहित वनप्रदेश में होनेवाले (मा मादयन्ति) मुझे हर्षित करते हैं (मौजवतस्य सोमस्य इव भक्षः) मूँजवाले पर्वत पर उत्पन्न हुए सोम ओषधि विशेष के भक्षण की भाँति विभीदक वृक्ष के फल का भक्षण स्वादवाला द्यूतक्रीडन-स्थान में होता है (मह्यं-जागृविः-अच्छान्) मुझे जागृति देनेवाला होता मेरे ऊपर छाया हुआ है ॥१॥

भावार्थ : अक्ष जुआ खेलने के पाशे जुआरी को जुआ खेलने में सोमपान जैसा हर्ष अनुभव कराते हैं और जागृति देते हैं, ऐसा वह समझा करता है ॥१॥