Rigveda / 10 / 34 / 5
यदा॒दीध्ये॒ न द॑विषाण्येभिः परा॒यद्भ्योऽव॑ हीये॒ सखि॑भ्यः । न्यु॑प्ताश्च ब॒भ्रवो॒ वाच॒मक्र॑तँ॒ एमीदे॑षां निष्कृ॒तं जा॒रिणी॑व ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 34 | Mantra No : 5
In English:
Seer : kavaSha ailuuSha akSho vaa maujavaan | Devta : akShakitavanindaa | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yadaadiidhye na daviShaaNyebhiH paraayadbhyo.ava hiiye sakhibhyaH . nyuptaashcha babhravo vaachamakrat.N emiideShaa.m niShkRRita.m jaariNiiva .
Component Words : yat . aa.adiidhye . na . daviShaaNi . ebhiH . paraayat.abhyaH . ava . hiiye . sakhi.abhyaH . ni.auptaaH . cha . babhravaH . vaacham . akrata . emi . it . eShaam . niH.akRRitam . jaariNii.aiva . 10.34.5
In Hindi:
ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकितवनिन्दा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : यत् । आ॒ऽदी॒ध्ये॒ । न । द॒वि॒षा॒णि॒ । ए॒भिः॒ । प॒रा॒यत्ऽभ्यः॑ । अव॑ । हीये॑ । सखि॑ऽभ्यः । निऽउ॑प्ताः । च॒ । ब॒भ्रवः॑ । वाच॑म् । अक्र॑त । एमि॑ । इत् । ए॒षा॒म् । निः॒ऽकृ॒तम् । जा॒रिणी॑ऽइव ॥ १०.३४.५
पदार्थ : (यत्-आदीध्ये-एभिः-न दविषाणि) जब मैं सङ्कल्प करता हूँ कि इन पाशों से नहीं खेलूँगा (परायद्भ्यः सखिभ्यः-अवहीये) मुझ पर प्रभाव डालनेवाले आते हुए जुआरी साथियों से मैं दब जाता हूँ, (बभ्रवः-न्युप्ताः-च वाचम्-अक्रत) चमकते हुए जुए के पाशे फैंके हुए जब शब्द करते हैं, (एषां निष्कृतं जारिणी-इव-एमि) इन पाशों के सजे स्थान की ओर व्यभिचारिणी स्त्री की भाँति चला जाता हूँ ॥५॥
भावार्थ : जुए का व्यसन जब किसी को पड़ जाता है, उससे बचना कठिन हो जाता है। बचने की भावना या संकल्प होते हुए भी पुराने साथियों को और जुए के स्थान को देखकर जुए की ओर फिर चल पड़ता है। यह व्यसन बहुत बुरा है और इससे बचना चाहिये ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकितवनिन्दा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : यत् । आ॒ऽदी॒ध्ये॒ । न । द॒वि॒षा॒णि॒ । ए॒भिः॒ । प॒रा॒यत्ऽभ्यः॑ । अव॑ । हीये॑ । सखि॑ऽभ्यः । निऽउ॑प्ताः । च॒ । ब॒भ्रवः॑ । वाच॑म् । अक्र॑त । एमि॑ । इत् । ए॒षा॒म् । निः॒ऽकृ॒तम् । जा॒रिणी॑ऽइव ॥ १०.३४.५
भावार्थ :