Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 36 / 5

एन्द्रो॑ ब॒र्हिः सीद॑तु॒ पिन्व॑ता॒मिळा॒ बृह॒स्पति॒: साम॑भिॠ॒क्वो अ॑र्चतु । सु॒प्र॒के॒तं जी॒वसे॒ मन्म॑ धीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 36 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : लुशो धानाकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आ । इन्द्रः॑ । ब॒र्हिः । सीद॑तु । पिन्व॑ताम् । इळा॑ । बृह॒स्पतिः॑ । साम॑ऽभिः । ऋ॒क्वः । अ॒र्च॒तु॒ । सु॒ऽप्र॒के॒तम् । जी॒वसे॑ । मन्म॑ । धी॒म॒हि॒ । तत् । दे॒वाना॑म् । अवः॑ । अ॒द्य । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.३६.५

पदार्थ : (जीवसे) जीवन के लिये (इन्द्रः-बर्हिः-आ सीदतु) ऐश्वर्यवान् परमात्मा हृदयाकाश में विराजमान हो-साक्षात् हो (इळा पिन्वताम्) अन्नरसरूप भोग-सामग्री शरीर को सींचे-परिपुष्ट करे (ऋक्वः-बृहस्पतिः-सामभिः-अर्चतु) स्तुति करनेवाला आत्मा शान्त स्तुतियों से परमात्मा की स्तुति करे (सुप्रकेतं मन्म धीमहि) अच्छे प्रज्ञान उत्तम निर्णय और मनन-विचार को हम धारण करें। (तद्देवा०) आगे पूर्ववत् ॥५॥

भावार्थ : जीवनवृद्धि के लिए परमात्मा हृदय में साक्षात् हो। अन्न रसादि सामग्री हमारे शरीर को पुष्ट करे। आत्मा उत्तम स्तुतियों से परमात्मा की अर्चना करे। बुद्धि उत्तम निर्णय और मन अच्छा मनन करे, तो जीवन सफल है ॥५॥