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Rigveda / 10 / 36 / 7

उप॑ ह्वये सु॒हवं॒ मारु॑तं ग॒णं पा॑व॒कमृ॒ष्वं स॒ख्याय॑ श॒म्भुव॑म् । रा॒यस्पोषं॑ सौश्रव॒साय॑ धीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 36 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : लुशो धानाकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : उप॑ । ह्व॒ये॒ । सु॒ऽहव॑म् । मारु॑तम् । ग॒णम् । पा॒व॒कम् । ऋ॒ष्वम् । स॒ख्याय॑ । श॒म्ऽभुव॑म् । रा॒यः । पोष॑म् । सौ॒श्र॒व॒साय॑ । धी॒म॒हि॒ । तत् । दे॒वाना॑म् । अवः॑ । अ॒द्य । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.३६.७

पदार्थ : (सुहवं पावकम्) सुन्दर आह्वान करने योग्य पवित्रकारक (शम्भुवम्) कल्याणकारक (ऋष्वम्) महान् (मारुतं गणम्) जीवन्मुक्त विद्वानों के मण्डल को (सख्याय-उपह्वये) मित्रता के लिये अपने समीप आमन्त्रित करता हूँ (रायस्पोषम्) ज्ञानधन के पोषक (सौश्रवसाय) उत्तम श्रवण करानेवाले का (धीमहि) मन में चिन्तन करें-संकल्प करें। आगे पूर्व के समान ॥७॥

भावार्थ : ऊँचे विद्वान्, जीवन्मुक्त, पवित्रकारक, कल्याणसाधक, ज्ञानधन के वर्द्धक तथा उपदेश देनेवाले महानुभावों की मित्रता और उनसे उपदेश का लाभ लेना चाहिये ॥७॥