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Rigveda / 10 / 39 / 10

यु॒वं श्वे॒तं पे॒दवे॑ऽश्वि॒नाश्वं॑ न॒वभि॒र्वाजै॑र्नव॒ती च॑ वा॒जिन॑म् । च॒र्कृत्यं॑ ददथुर्द्राव॒यत्स॑खं॒ भगं॒ न नृभ्यो॒ हव्यं॑ मयो॒भुव॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 39 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : घोषा काक्षीवती | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : यु॒वम् । श्वे॒तम् । पे॒दवे॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । अश्व॑म् । न॒वऽभिः॑ । वाजैः॑ । न॒व॒ती । च॒ । वा॒जिन॑म् । च॒र्कृत्य॑म् । द॒द॒थुः॒ । द्र॒व॒यत्ऽस॑खम् । भग॑म् । न । नृऽभ्यः॑ । हव्य॑म् । म॒यः॒ऽभुव॑म् ॥ १०.३९.१०

पदार्थ : (युवम्-अश्विना) हे अध्यापक उपदेशकों ! तुम दोनों (पेदवे) सुख प्राप्त करनेवाले आत्मा के लिए (नवभिः-वाजैः-नवती च) नौ अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारसम्बन्धी और पञ्चज्ञानेन्द्रियसम्बन्धी, बलों और प्रवृत्तियों से युक्त (श्वेतं वाजिनम्) शुद्ध भोगवाले देह को (चर्कृत्यम्) पुनः-पुनः भोगप्राप्त करनेवाले को (द्रावयत्सखम्) रस-रक्त रिसाती हुई नाड़ियाँ सखीभूत जिसकी हैं, उस ऐसे को (ददथुः) जीवन देते हो (नृभ्यः-मयोभुवं हव्यं भगम्-न) नेताजनों जीवन्मुक्तों के लिए मोक्ष जैसे कल्याण को भावित करनेवाले हो-ऐश्वर्य को देते हो ॥१०॥

भावार्थ : अध्यापक और उपदेशक सुख के इच्छुक अधिकारी को उसके अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियसम्बन्धी प्रवृत्तियों से युक्त देह को पुनः-पुनः सुखभोग का साधन बनाते हैं ॥१०॥