Rigveda / 10 / 40 / 10
जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियु॒र्नर॑: । वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इ॒दं स॑मेरि॒रे मय॒: पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 40 | Mantra No : 10
In English:
Seer : ghoShaa kaakShiivatii | Devta : ashvinau | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : jiiva.m rudanti vi mayante adhvare diirghaamanu prasiti.m diidhiyurnaraH . vaama.m pitRRibhyo ya ida.m samerire mayaH patibhyo janayaH pariShvaje .
Component Words : jiivam . rudanti . vi . mayante . adhvare . diirghaam . anu . pra.asitim . diidhiyuH . naraH . vaamam . pitRRi.abhyaH . ye . idam . sam.aerire . mayaH . pati.abhyaH . janayaH . pari.asvaje . 10.40.10
In Hindi:
ऋषि : घोषा काक्षीवती | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : जी॒वम् । रु॒द॒न्ति॒ । वि । म॒य॒न्ते॒ । अ॒ध्व॒रे । दी॒र्घाम् । अनु॑ । प्रऽसि॑तिम् । दी॒धि॒युः॒ । नरः॑ । वा॒मम् । पि॒तृऽभ्यः॑ । ये । इ॒दम् । स॒म्ऽए॒रि॒रे । मयः॑ । पति॑ऽभ्यः । जन॑यः । प॒रि॒ऽस्वजे॑ ॥ १०.४०.१०
पदार्थ : (जीवं रुदन्ति) पुत्र की प्राप्ति के लिए गृहस्थजन आर्द्रभाव से प्रार्थना करते हैं (अध्वरे विमयन्ते) विवाहयज्ञ में विशिष्ट प्रतिज्ञारूप वचन बोलते हैं (दीर्घां प्रसितिम्-अनु नरः-दीधियुः) दीर्घकालवाली स्नेहबन्धनी को मनुष्य प्रकाशित करते हैं-प्रदर्शित करते हैं-व्यवहार में लाते हैं (पितृभ्यः-वामम्) अपने पिता आदि बड़े लोगों के लिए श्रेष्ठ वस्तु को समर्पित करते हैं (ये-इदं मयः समेरिरे) जो इस गार्हस्थ्य सुख को सम्पादित करते हैं (जनयः पतिभ्यः परिष्वजे) पत्नियाँ पतियों के लिए परिष्वङ्ग अर्थात् समागम करती हैं ॥१०॥
भावार्थ : जो स्त्री-पुरुष गृहस्थ आश्रम को स्वीकार करते हैं, उन्हें आजीवन परस्पर स्नेहबन्धन की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और उसे निभाना चाहिए। सन्तानप्राप्ति की आकाङ्क्षा गृहस्थी जनों को रखनी चाहिए ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : घोषा काक्षीवती | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : जी॒वम् । रु॒द॒न्ति॒ । वि । म॒य॒न्ते॒ । अ॒ध्व॒रे । दी॒र्घाम् । अनु॑ । प्रऽसि॑तिम् । दी॒धि॒युः॒ । नरः॑ । वा॒मम् । पि॒तृऽभ्यः॑ । ये । इ॒दम् । स॒म्ऽए॒रि॒रे । मयः॑ । पति॑ऽभ्यः । जन॑यः । प॒रि॒ऽस्वजे॑ ॥ १०.४०.१०
भावार्थ :