Rigveda / 1 / 181 / 4
इ॒हेह॑ जा॒ता सम॑वावशीतामरे॒पसा॑ त॒न्वा॒३॒॑ नाम॑भि॒: स्वैः। जि॒ष्णुर्वा॑म॒न्यः सुम॑खस्य सू॒रिर्दि॒वो अ॒न्यः सु॒भग॑: पु॒त्र ऊ॑हे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 181 | Mantra No : 4
In English:
Seer : agastyo maitraavaruNiH | Devta : ashvinau | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : iheha jaataa samavaavashiitaamarepasaa tanvaa3 naamabhiH svaiH. jiShNurvaamanyaH sumakhasya suurirdivo anyaH subhagaH putra uuhe .
Component Words : iha.aiha. jaataa. sam. avaavashiitaam. arepasaa. tanvaa. naama.abhiH. svaiH. jiShNuH. vaam. anyaH. su.amakhasya. suuriH. divaH. anyaH. su.abhagaH. putraH. uuhe . 1.181.4
In Hindi:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : इ॒हऽइ॑ह। जा॒ता। सम्। अ॒वा॒व॒शी॒ता॒म्। अ॒रे॒पसा॑। त॒न्वा॑। नाम॑ऽभिः। स्वैः। जि॒ष्णुः। वा॒म्। अ॒न्यः। सुऽम॑खस्य। सू॒रिः। दि॒वः। अ॒न्यः। सु॒ऽभगः॑। पु॒त्रः। ऊ॒हे॒ ॥ १.१८१.४
पदार्थ : हे (अरेपसा) निष्पाप सर्वगुणव्यापी अध्यापक और उपदेशक जन (इहेह) इस जगत् में (जाता) प्रसिद्ध हुए आप लोगो ! अपने (तन्वा) शरीर से और (स्वैः) अपने (नामभिः) नामों के साथ (सम्, अवावशीताम्) निरन्तर कामना करनेवाले हूजिये (वाम्) तुम में से (जिष्णुः) जीतने के स्वभाववाला (अन्यः) दूसरा (सुमखस्य) सुख के (दिवः) प्रकाश से (सूरिः) विद्वान् (अन्यः) और (सुभगः) सुन्दर ऐश्वर्य्यवान् (पुत्रः) पवित्र करता है उसको (ऊहे) तर्कता हूँ—तर्क से कहता हूँ ॥ ४ ॥
भावार्थ : हे मनुष्यो ! इस सृष्टि में भूगर्भादि विद्या को जानके जो जीतनेवाला अध्यापक बहुत ऐश्वर्य्यवाला सबका रक्षक पदार्थविद्या को तर्क से जाने, वह प्रसिद्ध होता है ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : इ॒हऽइ॑ह। जा॒ता। सम्। अ॒वा॒व॒शी॒ता॒म्। अ॒रे॒पसा॑। त॒न्वा॑। नाम॑ऽभिः। स्वैः। जि॒ष्णुः। वा॒म्। अ॒न्यः। सुऽम॑खस्य। सू॒रिः। दि॒वः। अ॒न्यः। सु॒ऽभगः॑। पु॒त्रः। ऊ॒हे॒ ॥ १.१८१.४
पदार्थ : (इहेह) अस्मिञ्जगति। अत्र वीप्सायां द्वित्वं प्रकर्षद्योतनार्थम् (जाता) जातौ (सम्) सम्यक् (अवावशीताम्) भृशं कामयेथाम्। वशकान्तावित्यस्य यङ्लुगन्तं लङि रूपम्। (अरेपसा) न विद्यते रेपः पापं ययोस्तौ (तन्वा) शरीरेण (नामभिः) आख्याभिः (स्वैः) स्वकीयैः (जिष्णुः) जेतुं शीलः (वाम्) युवयोर्मध्ये (अन्यः) द्वितीयः (सुमखस्य) (सूरिः) विद्वान् (दिवः) प्रकाशात् (अन्यः) (सुभगः) सुन्दरैश्वर्यः (पुत्रः) यः पुनाति सः (ऊहे) वितर्कयामि ॥ ४ ॥
अन्वय : हे अरेपसाऽश्विनौ युवयोरिहेह जाता युवां स्वया तन्वा स्वैर्नामभिः समवावशीताम्। वां जिष्णुरन्यः सुमखस्य दिवः सूरिरन्यः सुभगः पुत्रोऽस्ति तमहमूहे ॥ ४ ॥
भावार्थ : मनुष्या अस्यां सृष्टौ भूगर्भादिविद्यां विज्ञाय यो जेताऽध्यापको बह्वैश्वर्य्यः सर्वस्य रक्षकः पदार्थविद्यां तर्केण विजानीयात् स प्रसिद्धो जायते ॥ ४ ॥