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Rigveda / 10 / 43 / 7

आपो॒ न सिन्धु॑म॒भि यत्स॒मक्ष॑र॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ कु॒ल्या इ॑व ह्र॒दम् । वर्ध॑न्ति॒ विप्रा॒ महो॑ अस्य॒ साद॑ने॒ यवं॒ न वृ॒ष्टिर्दि॒व्येन॒ दानु॑ना ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 43 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कृष्णः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आपः॑ । न । सिन्धु॑म् । अ॒भि । यत् । स॒म्ऽअक्ष॑रन् । सोमा॑सः । इन्द्र॑म् । कु॒ल्याःऽइ॑व । ह्र॒दम् । वर्ध॑न्ति । विप्राः॑ । महः॑ । अ॒स्य॒ । साद॑ने । यव॑म् । न । वृ॒ष्टिः । दि॒व्येन॑ । दानु॑ना ॥ १०.४३.७

पदार्थ : (आपः-न सिन्धुं यत्) जलप्रवाह-नदियाँ जैसे समुद्र के प्रति (कुल्याः-इव ह्रदम्) या जैसे नहरें बड़े जलाशय या बड़ी नदियों के प्रति (सम् अभि अक्षरन्) अभिलक्षित होकर बहती हैं, ऐसे ही (सोमासः-इन्द्रम्) उपासकों के उपासनारसप्रवाह परमात्मा के प्रति बहते हैं (सदने-अस्य महः) हृदय में इस महान् परमात्मा को (विप्राः-वर्धन्ति) उपासक बढ़ाते हैं-साक्षात् करते हैं (वृष्टिः-दिव्येन दानुना यवं न) या जैसे वर्षणशील मेघ जलप्रदान से खेती के अन्न को बढ़ाता है ॥७॥

भावार्थ : नदियाँ जैसे समुद्र को और नहरें जैसे बड़े जलाशय अथवा नदी को प्राप्त होती हैं, ऐसे ही उपासकों के उपासनाप्रवाह परमात्मा को प्राप्त होते हैं और वे उपासनाप्रवाह उपासकों के अन्दर परमात्मा को प्रवृद्ध करते हैं, जैसे मेघजल से खेती के अन्न प्रवृद्ध होते हैं ॥७॥