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Rigveda / 10 / 45 / 3

स॒मु॒द्रे त्वा॑ नृ॒मणा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तर्नृ॒चक्षा॑ ईधे दि॒वो अ॑ग्न॒ ऊध॑न् । तृ॒तीये॑ त्वा॒ रज॑सि तस्थि॒वांस॑म॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑वर्धन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 45 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स॒मु॒द्रे । त्वा॒ । नृ॒ऽमनाः॑ । अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । नृ॒ऽचक्षाः॑ । ई॒धे॒ । दि॒वः । अ॒ग्ने॒ । ऊध॑न् । तृ॒तीये॑ । त्वा॒ । रज॑सि । त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । म॒हि॒षाः । अ॒व॒र्ध॒न् ॥ १०.४५.३

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्नि ! (त्वा) तुझे (नृमणाः-नृचक्षाः) मनुष्यों में मननबल का प्रेरक तथा मनुष्यों के कर्म का द्रष्टा परमात्मा (दिवः-ऊधन्) द्युलोक के ज्योतिमण्डल में सूर्यरूप से, तथा (समुद्रे-अप्सु-अन्तः ईधे) अन्तरिक्ष में मेघों के अन्दर विद्युद्रूप में दीप्त करता है (तृतीये रजसि तस्थिवांसम्) तीसरे पृथिवीलोक में स्थित ओषधियों में कोष्ठों में वर्त्तमान, तथा (अपाम्-उपस्थे) जलप्रवाहों के मध्य में वर्तमान (महिषाः-अवर्धन्) ऋत्विज् विद्वान प्रकट करते हैं-बढ़ाते हैं ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा आग्नेय तत्त्व को द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर पार्थिव अग्नि के रूप में उत्पन्न करता है, पुनः ऋत्विक् लोग य विद्वान् उसे अपने विविध कार्यों में प्रकट करके उपयोग में लाते हैं ॥३॥