Rigveda / 10 / 45 / 6
विश्व॑स्य के॒तुर्भुव॑नस्य॒ गर्भ॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ज्जाय॑मानः । वी॒ळुं चि॒दद्रि॑मभिनत्परा॒यञ्जना॒ यद॒ग्निमय॑जन्त॒ पञ्च॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 45 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vatsapriH | Devta : agniH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : vishvasya keturbhuvanasya garbha aa rodasii apRRiNaajjaayamaanaH . viiLu.m chidadrimabhinatparaaya~njanaa yadagnimayajanta pa~ncha .
Component Words : vishvasya . ketuH . bhuvanasya . garbhaH . aa . rodasii iti . apRRiNaat . jaayamaanaH . viiLum . chit . adrim . abhinat . paraa.ayan . janaaH . yat . agnim . ayajanta . pa~ncha . 10.45.6
In Hindi:
ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : विश्व॑स्य । के॒तुः । भुव॑नस्य । गर्भः॑ । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णा॒त् । जाय॑मानः । वी॒ळुम् । चि॒त् । अद्रि॑म् । अ॒भि॒न॒त् । प॒रा॒ऽयन् । जनाः॑ । यत् । अ॒ग्निम् । अय॑जन्त । पञ्च॑ ॥ १०.४५.६
पदार्थ : (विश्वस्य केतुः) संसार का प्रकाशक, प्रेरक, संचालक (भुवनस्य गर्भः) प्राणिमात्र का ग्रहण करनेवाला-स्वीकार करनेवाला (जायमानः-रोदसी-अपृणात्) उदय होता हुआ द्युलोक और पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से भर देता है-छिन्न-भिन्न कर देता है (परायन् वीळुं चित्-अद्रिम्-अभिनत्) बलवान् मेघ को भी पराक्रम से तोड़ देता है-छिन्न-भिन्न कर देता है (यत्-पञ्च जनाः-अग्निम्-अयजन्त) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद नामक पाँचों जन जब अग्निहोत्र में अग्नि का यजन करते हैं, उस समय ॥६॥
भावार्थ : सूर्य संसार में प्रगति देनेवाला है, आकाश और पृथ्वी के मध्य में अपने प्रकाश को भर देता है। मनुष्यमात्र जब सामूहिकरूप से यजन करते हैं और यज्ञ में मेघ बनते हैं, उन मेघों को पृथ्वी पर बरसा देनेवाला सूर्य है। वह मेघों को छिन्न-भिन्न कर पृथ्वी पर बरसा देता है, जो प्राणियों के पोषण का निमित्त बनता है ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : विश्व॑स्य । के॒तुः । भुव॑नस्य । गर्भः॑ । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णा॒त् । जाय॑मानः । वी॒ळुम् । चि॒त् । अद्रि॑म् । अ॒भि॒न॒त् । प॒रा॒ऽयन् । जनाः॑ । यत् । अ॒ग्निम् । अय॑जन्त । पञ्च॑ ॥ १०.४५.६
भावार्थ :