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Rigveda / 10 / 46 / 4

म॒न्द्रं होता॑रमु॒शिजो॒ नमो॑भि॒: प्राञ्चं॑ य॒ज्ञं ने॒तार॑मध्व॒राणा॑म् । वि॒शाम॑कृण्वन्नर॒तिं पा॑व॒कं ह॑व्य॒वाहं॒ दध॑तो॒ मानु॑षेषु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 46 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : म॒न्द्रम् । होता॑रम् । उ॒शिजः॑ । नमः॑ऽभिः । प्राञ्च॑म् । य॒ज्ञम् । ने॒तार॑म् । अ॒ध्व॒राणा॑म् । वि॒शाम् । अ॒कृ॒ण्व॒न् । अ॒र॒तिम् । पा॒व॒कम् । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । दध॑तः । मानु॑षेषु ॥ १०.४६.४

पदार्थ : (मानुषेषु दधतः-उशिजः) मनुष्यों के मध्य में जो अपने अन्दर धारण करने के हेतु कामना रखनेवाले (मन्द्रं होतारम्) हर्षित करनेवाले तथा स्वीकार करनेवाले (यज्ञम्) सङ्गमनीय (अध्वराणां नेतारम्) अध्यात्ममार्ग में रमण करनेवालों के नेता (विशाम्-अरतिम्) मनुष्यादि प्रजाओं के स्वामी (पावकम्) पवित्रकारक (हव्यवाहम्) स्तुतिप्रार्थनोपहार के स्वीकार करनेवाले परमात्मा को (प्राञ्चम्-अकृण्वन्) साक्षात् करते हैं ॥४॥

भावार्थ : मनुष्यों में जो परमात्मा को अपने अन्दर धारण करने के अत्यन्त इच्छुक होते हैं और पवित्र आचरणवाले तथा श्रद्धा से उपासना करते हैं, वे ही प्राणिमात्र के स्वामी हर्षित करनेवाले परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं ॥४॥