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Rigveda / 1 / 182 / 2

इन्द्र॑तमा॒ हि धिष्ण्या॑ म॒रुत्त॑मा द॒स्रा दंसि॑ष्ठा र॒थ्या॑ र॒थीत॑मा। पू॒र्णं रथं॑ वहेथे॒ मध्व॒ आचि॑तं॒ तेन॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ याथो अश्विना ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 182 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : इन्द्र॑ऽतमा। हि। धिष्ण्या॑। म॒रुत्ऽत॑मा। द॒स्रा। दंसि॑ष्ठा। र॒थ्या॑। र॒थिऽत॑मा। पू॒र्णम्। रथ॑म्। व॒हे॒थे॒ इति॑। मध्वः॑। आचि॑तम्। तेन॑। दा॒श्वांस॑म्। उप॑। या॒थः॒। अ॒श्वि॒ना॒ ॥ १.१८२.२

पदार्थ : हे (अश्विना) अध्यापकोपदेशक जनो ! (हि) तुम्हीं (इन्द्रतमा) अतीव ऐश्वर्य्ययुक्त (धिष्ण्या) प्रगल्भ (मरुत्तमा) अत्यन्त विद्वानों को साथ लिये हुए (दस्रा) दुःख के दूर करनेवाले (दंसिष्ठा) अतीव पराक्रमी (रथ्या) रथ चलाने में श्रेष्ठ और (रथीतमा) प्रशंसित पराक्रमयुक्त हों और (मध्वः) मधु से (आचितम्) भरे हुए (पूर्णम्) शस्त्र और अस्त्रों से परिपूर्ण जिस (रथम्) रथ को (वहेथे) प्राप्त होते हो (तेन) और उससे (दाश्वांसम्) विद्या देनेवाले जन के (उप, याथः) समीप जाते हो वे हम लोगों को नित्य सत्कार करने योग्य हों ॥ २ ॥

भावार्थ : जो बिजुली, अग्नि, जल और वायु इनसे चलाये हुए रथ पर स्थित हो देशदेशान्तर को जाते हैं, वे परिपूर्ण धन जीतनेवाले होते हैं ॥ २ ॥