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Rigveda / 10 / 49 / 11

ए॒वा दे॒वाँ इन्द्रो॑ विव्ये॒ नॄन्प्र च्यौ॒त्नेन॑ म॒घवा॑ स॒त्यरा॑धाः । विश्वेत्ता ते॑ हरिवः शचीवो॒ऽभि तु॒रास॑: स्वयशो गृणन्ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 49 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : स्वराडार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒व । दे॒वान् । इन्द्रः॑ । वि॒व्ये॒ । नॄन् । प्र । च्यौ॒त्नेन॑ । म॒घऽवा॑ । स॒त्यऽरा॑धाः । विश्वा॑ । इत् । ता । ते॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । श॒ची॒ऽवः॒ । अ॒भि । तु॒रासः॑ । स्व॒ऽय॒शः॒ । गृ॒ण॒न्ति॒ ॥ १०.४९.११

पदार्थ : (एव मघवा सत्यराधाः-इन्द्रः) इस प्रकार गुणयुक्त सृष्टियज्ञ का कर्त्ता नित्यधनवान् मोक्षरूपस्थिर धनवान् मोक्ष का दाता परमात्मा (नॄन् देवान्) मुमुक्षु विद्वानों को (च्यौत्नेन) शरीरबन्धन को च्युत करनेवाले बल से (प्र विव्ये) प्रकृष्टरूप से अपनाता है (हरिवः शचीवः स्वयशः) हे दुःखहरण करनेवाले, दया और प्रसाद जिसके हैं, ऐसे हे कर्मवाले तथा स्वाधार यशवाले परमात्मन् !  (ते ता विश्वा तुरासः-अभि गृणन्ति) तेरे उन सब कार्यों को संयमी संसारसागर को तरनेवाले निरन्तर तेरी स्तुति करते हैं ॥११॥

भावार्थ : परमात्मा स्वाधार यशवाला है, मोक्षरूप धन का स्वामी है, मुमुक्षु उपासकों को अपनाता है, उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। उसके दयाप्रसाद मानव के लिए भारी हितकर हैं। संयमी जन संसारसागर से तरने के लिए उसकी स्तुति करते हैं ॥११॥