Rigveda / 10 / 53 / 6
तन्तुं॑ त॒न्वन्रज॑सो भा॒नुमन्वि॑हि॒ ज्योति॑ष्मतः प॒थो र॑क्ष धि॒या कृ॒तान् । अ॒नु॒ल्ब॒णं व॑यत॒ जोगु॑वा॒मपो॒ मनु॑र्भव ज॒नया॒ दैव्यं॒ जन॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 53 | Mantra No : 6
In English:
Seer : devaaH | Devta : agniH sauchiikaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tantu.m tanvanrajaso bhaanumanvihi jyotiShmataH patho rakSha dhiyaa kRRitaan . anulbaNa.m vayata joguvaamapo manurbhava janayaa daivya.m janam .
Component Words : tantum . tanvan . rajasaH . bhaanum . anu . ihi . jyotiShmataH . pathaH . rakSha . dhiyaa . kRRitaan . anulbaNam . vayata . joguvaam . apaH . manuH . bhava . janaya . daivyam . janam . 10.53.6
In Hindi:
ऋषि : देवाः | देवता : अग्निः सौचीकः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : तन्तु॑म् । त॒न्वन् । रज॑सः । भा॒नुम् । अनु॑ । इ॒हि॒ । ज्योति॑ष्मतः । प॒थः । र॒क्ष॒ । धि॒या । कृ॒तान् । अ॒नु॒ल्ब॒णम् । व॒य॒त॒ । जोगु॑वाम् । अपः॑ । मनुः॑ । भ॒व॒ । ज॒नय॑ । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥ १०.५३.६
पदार्थ : (तन्तुं तन्वन्) हे गृहस्थ के कुल-पितृकुल में या गुरुकुल में उत्पन्न या निष्णात विद्वन् ! तू सन्ततिक्रम का शिष्यक्रम का विस्तार करता हुआ या विस्तार करने के हेतु (रजसः-भानुम्-अनु इहि) मनोरञ्जन के या अध्यात्मरञ्जन के परम्परा से प्रसिद्ध ज्ञान का अनुष्ठान कर (धिया कृतान्) कर्म से किये या बुद्धि से किये (ज्योतिष्मतः पथः-रक्ष) बहुत न्याययुक्त मार्गों का पालन कर (जोगुवाम्-अनुल्बणम्-अपः-वयत) उत्तम उपदेश करनेवालों के दोषरहित कर्म को जीवन में बढ़ा (मनुः-भव) मननशील हो (दैव्यं जनं जनय) दिव्यगुणवाले को उत्पन्न कर तथा शिष्य को तैयार कर ॥६॥
भावार्थ : मानव को चाहिए श्रेष्ठ सन्तान और श्रेष्ठ शिष्य का विस्तार करे। अपने जीवन में धर्म्य मार्गों का आलम्बन करते हुए मननशील होकर उत्तम गुणयुक्त पुत्र और शिष्य के निर्माण में यत्न करता रहे ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : देवाः | देवता : अग्निः सौचीकः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : तन्तु॑म् । त॒न्वन् । रज॑सः । भा॒नुम् । अनु॑ । इ॒हि॒ । ज्योति॑ष्मतः । प॒थः । र॒क्ष॒ । धि॒या । कृ॒तान् । अ॒नु॒ल्ब॒णम् । व॒य॒त॒ । जोगु॑वाम् । अपः॑ । मनुः॑ । भ॒व॒ । ज॒नय॑ । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥ १०.५३.६
भावार्थ :