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Rigveda / 10 / 53 / 11

गर्भे॒ योषा॒मद॑धुर्व॒त्समा॒सन्य॑पी॒च्ये॑न॒ मन॑सो॒त जि॒ह्वया॑ । स वि॒श्वाहा॑ सु॒मना॑ यो॒ग्या अ॒भि सि॑षा॒सनि॑र्वनते का॒र इज्जिति॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 53 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : देवाः | देवता : अग्निः सौचीकः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : गर्भे॑ । योषा॑म् । अद॑धुः । व॒त्सम् । आ॒सनि॑ । अ॒पी॒च्ये॑न । मन॑सा । उ॒त । जि॒ह्वया॑ । सः । वि॒श्वाहा॑ । सु॒ऽमनाः॑ । यो॒ग्याः । अ॒भि । स॒सा॒सनिः॑ । व॒न॒ते॒ । का॒रः । इत् । जिति॑म् ॥ १०.५३.११

पदार्थ : (येषां गर्भे वत्सम्-अदधुः) वाणी के अन्दर वक्तव्य अर्थात् अभिप्राय को विद्वान् धारण करते हैं (आसनि) और मुख में बोलने योग्य वचन को धारण करते हैं (अपीच्येन मनसा-उत जिह्वया) अन्तर्हित मन से तथा जिह्वा से उसे प्रकट-प्रकाशित करते हैं (सः-कारः) वह स्तुतिकर्त्ता (सुमनाः) प्रसन्नमन या शुद्धमनवाला होकर (विश्वाहा योग्याः) सदा योग्य वाणियाँ-स्तुतियाँ (अभि सिषासनिः) सम्यक् समर्पित करता हुआ परमात्मा के प्रति प्राप्त कराता हुआ (जितिम्-इत्-वनते) जीवन में विजय को सफलता को सेवन करता है ॥११॥

भावार्थ : विद्वान् लोग विद्या के अन्दर जो अभिप्राय होता है, उसे अपने अन्दर धारण करते हैं, अन्यों के लिए मौखिक प्रवचन करते हैं। इसी प्रकार मन और वाणी से परमात्मा की स्तुति करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं ॥११॥