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Rigveda / 10 / 55 / 6

शाक्म॑ना शा॒को अ॑रु॒णः सु॑प॒र्ण आ यो म॒हः शूर॑: स॒नादनी॑ळः । यच्चि॒केत॑ स॒त्यमित्तन्न मोघं॒ वसु॑ स्पा॒र्हमु॒त जेतो॒त दाता॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 55 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वृहदुक्थो वामदेव्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : शाक्म॑ना । शा॒कः । अ॒रु॒णः । सु॒ऽप॒र्णः । आ । यः । म॒हः । शूरः॑ । स॒नात् । अनी॑ळः । यत् । चि॒केत॑ । स॒त्यम् । इत् । तत् । न । मोघ॑म् । वसु॑ । स्पा॒र्हम् । उ॒त । जेता॑ । उ॒त । दाता॑ ॥ १०.५५.६

पदार्थ : (यः) जो परमात्मा (शाक्मना शाकः) बल से अथवा शक्य कर्म करने के हेतु समर्थ है (अरुणः) तेजस्वी (सुपर्णः) उत्तम पालन करनेवाला (महः-शूरः) महान् शूरवीर है (सनात्) शाश्वतिक (अनीडः) अनेकदेशी-अनन्त-सर्वव्यापक (यत्-आ चिकेत) जो भलीभाँति जानता है (तत्-सत्यम्-इत्) वह सत्य ही होता है और सत्य ही जानता है (न मोघम्) व्यर्थ नहीं होता है, असत्य नहीं होता है (उत स्पार्हं वसु जेता) स्पृहणीय धन, मोक्षधन-आत्मा को बसानेवाले धन को जीतता है, प्राप्त करता है (उत दाता) हाँ, मुमुक्षुओं के लिए देता है ॥६॥

भावार्थ : परमात्मा सृष्टि के रचने और जीवों को कर्मफल देने में सर्वथा समर्थ है। वह किसी एक नियत देश में नहीं, अपितु अनन्त है। वह शाश्वतिक है, सत्यस्वरूप है। उसके कार्य सत्य हैं, व्यर्थ अर्थात् असत्य नहीं हैं। अधिकारी मुमुक्षुओं को चाहने योग्य और बसाने योग्य मोक्ष धन को देता है ॥६॥