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Rigveda / 10 / 56 / 4

म॒हि॒म्न ए॑षां पि॒तर॑श्च॒नेशि॑रे दे॒वा दे॒वेष्व॑दधु॒रपि॒ क्रतु॑म् । सम॑विव्यचुरु॒त यान्यत्वि॑षु॒रैषां॑ त॒नूषु॒ नि वि॑विशु॒: पुन॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 56 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वृहदुक्थो वामदेव्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : म॒हि॒म्नः । ए॒षा॒म् । पि॒तरः॑ । च॒न । ई॒शि॒रे॒ । दे॒वाः । दे॒वेषु । अ॒द॒धुः॒ । अपि॑ । क्रतु॑म् । सम् । अ॒वि॒व्य॒चुः॒ । उ॒त । यानि॑ । अत्वि॑षुः । आ । ए॒षा॒म् । त॒नूषु॑ । नि । वि॒वि॒शुः॒ । पुन॒रिति॑ ॥ १०.५६.४

पदार्थ : (देवाः-देवेषु-अपि क्रतुम्-अदधुः) विद्वान् जन अपनी इन्द्रियों में शिवसङ्कल्प-सद्भावना को भरते हैं (एषां महिम्नः पितरः-चन ईशिरे) इसके महत्त्वपूर्ण प्रवचन द्वारा गृहस्थजन भी अपनी इन्द्रियों का स्वामित्व करते हैं। (सम् विव्यथुः) उनका सम्यक् व्यवहार करते हैं (उत) और (यानि-अत्विषुः) जिन स्थानों जन्मस्थानों को प्रकाशित करते हैं (एषां तनूषु) इनके शरीरों में (पुनः-निविविशुः) पुनः निविष्ट होते हैं-पुनः प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥

भावार्थ : विद्वान् जन शिवसंकल्प या सद्भाव के अनुसार अपनी इन्द्रियों को चलाते हैं तथा गृहस्थ जन भी उनके उपदेशानुसार अपनी इन्द्रियों का स्वामित्व करते हैं और उन-उनके अपने स्थानों में अपनी शक्ति द्वारा प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥