Rigveda / 10 / 58 / 2
यत्ते॒ दिवं॒ यत्पृ॑थि॒वीं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 58 | Mantra No : 2
In English:
Seer : bandhvaadayo gaupaayanaaH | Devta : mana aavarttanam | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yatte diva.m yatpRRithivii.m mano jagaama duurakam . tatta aa vartayaamasiiha kShayaaya jiivase .
Component Words : yat . te . divam . yat . pRRithiviim . manaH . jagaama . duurakam . tat . te . aa . vartayaamasi . iha . kShayaaya . jiivase . 10.58.2
In Hindi:
ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : मन आवर्त्तनम् | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : यत् । ते॒ । दिव॑म् । यत् । पृ॒थि॒वीम् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.२
पदार्थ : (यत्-ते मनः) हे मानसिक रोग के रोगी ! तेरा मन (दिवं यत् पृथिवीं मनः दूरकं जगाम) द्युलोक या पृथिवीलोक के प्रति जागरण काल में दूर चला गया है, उस (ते तत्…) तेरे मन को हम लौटाते हैं यथास्थान प्राप्ति के लिए और दीर्घजीवन धारण के लिए ॥२॥
भावार्थ : मानस रोगी के रोगी का मन जागते हुए भ्रान्त होकर के ग्रह-तारों की अन्यथा बातें करता हो, तो आश्वासन देकर स्वस्थ बनाना चाहिए ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : मन आवर्त्तनम् | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : यत् । ते॒ । दिव॑म् । यत् । पृ॒थि॒वीम् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.२
भावार्थ :