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Rigveda / 10 / 58 / 10

यत्ते॒ विश्व॑मि॒दं जग॒न्मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 58 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : मन आवर्त्तनम् | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : यत् । ते॒ । विश्व॑म् । इ॒दम् । जग॑त् । मनः॑ । ज॒गाम॑ । दूर॒कम् । तत् । ते॒ । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । इ॒ह । क्षया॑य । जी॒वसे॑ ॥ १०.५८.१०

पदार्थ : (ते) हे मानसरोग के रोगी जन ! तेरा (यत्-मनः) जो मन (इदं विश्वं जगत्-दूरकं जगाम) इस सम्पूर्ण संसार के प्रति दूर चला गया है (ते तत्……) पूर्ववत् ॥१०॥

भावार्थ : मन के रोगी का मन भ्रान्त अवस्था में सारे संसार में कभी कहीं, कभी कहीं, क्षण-क्षण में भटक रहा हो, तो उसे भी यथोचित आश्वासन उपचारों से स्वस्थ करें ॥१०॥