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Rigveda / 10 / 59 / 9

अव॑ द्व॒के अव॑ त्रि॒का दि॒वश्च॑रन्ति भेष॒जा । क्ष॒मा च॑रि॒ष्ण्वे॑क॒कं भर॑ता॒मप॒ यद्रपो॒ द्यौः पृ॑थिवि क्ष॒मा रपो॒ मो षु ते॒ किं च॒नाम॑मत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 59 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : बन्ध्वादयो गौपायनाः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अव॑ । द्व॒के इति॑ । अव॑ । त्रि॒का । दि॒वः । च॒र॒न्ति॒ । भे॒ष॒जा । क्ष॒मा । च॒रि॒ष्णु॒ । ए॒क॒कम् । भर॑ताम् । अप॑ । यत् । रपः॑ । द्यौः । पृ॒थि॒वि॒ । क्ष॒मा । रपः॑ । मो इति॑ । सु । ते॒ । किम् । च॒न । आ॒म॒म॒त् ॥ १०.५९.९

पदार्थ : (दिवः-द्वके) आकाश से-द्युलोक और अन्तरिक्षलोक के दो दोषनाशक रोगनाशक रश्मि और जल दो भेषज (त्रिका भेषजा) तीन दोषनाशक रोगनाशक भेषज रश्मि जल और पृथिवी की खानेवाली ओषधियाँ (अव चरन्ति) यहाँ प्राप्त होती हैं (क्षमा यत्-रपः) क्षमा से सरल स्वभाववत्ता से या असावधानी से हुए पाप या दोष को (एककं चरिष्णु) एकमात्र या एक-एक प्राप्त भेषज (अप भरताम्) दूर हटादे-दूर करता है (द्यौः पृथिवी……) पूर्ववत् ॥९॥

भावार्थ : मानव के रोगों या दोषों को दूर करने के लिए तीनों लोकों से भेषज प्राप्त होते हैं। द्युलोक से सूर्य रश्मियाँ, अन्तरिक्षलोक से वृष्टि जल और पृथिविलोक से खाद्य-भोज्य वनस्पति प्राप्त होती हैं। इनका उपयोग करके मनुष्य को स्वस्थ होना चाहिए तथा अपनी असावधानी से अपनी सन्तान को उक्त रोग या दोष से बचाये रखना चाहिए ॥९॥