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Rigveda / 10 / 61 / 2

स इद्दा॒नाय॒ दभ्या॑य व॒न्वञ्च्यवा॑न॒: सूदै॑रमिमीत॒ वेदि॑म् । तूर्व॑याणो गू॒र्तव॑चस्तम॒: क्षोदो॒ न रेत॑ इ॒तऊ॑ति सिञ्चत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 61 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सः । इत् । दा॒नाय॑ । दभ्या॑य । व॒न्वन् । च्यवा॑नः । सूदैः॑ । अ॒मि॒मी॒त॒ । वेदि॑म् । तूर्व॑याणः । गू॒र्तव॑चःऽतमः । क्षोदः॑ । न । रेतः॑ । इ॒तःऽऊ॑ति । सि॒ञ्च॒त् ॥ १०.६१.२

पदार्थ : (सः) वह विद्यास्नातक (इत्) अवश्य (च्यवानः) पापों का नष्ट करनेवाला (दानाय) अन्यों को विद्या दान देने के लिए (दभ्याय) दोषनाशन के लिए (वन्वन्) स्वयंवर के लिए या वधू को स्वीकार करने के लिए (सूदैः-वेदिम्-अमिमीत) ज्ञानामृत बरसानेवाले ऋत्विजों के सहयोग से विवाहवेदी को तैयार करता है (तूर्वयाणः) पाप नष्ट करने के लिए गमन जिसका है, वह ऐसा (गूर्तवचस्तमः) अत्यन्त तेजस्वी वक्ता (क्षोदः-न रेतः) जल समान अपने वीर्य को (इतः-ऊति) इस विधान से स्ववंशरक्षण और वर्धन के लिए (सिञ्चत्) पत्नी में सींचता है ॥२॥

भावार्थ : गृहस्थ में जानेवाला विद्यास्नातक अपने गुणकर्मानुसार वधू का स्मरण करे। ऊँचे ज्ञानामृत तथा वेदामृत बरसानेवाले ऋत्विजों के सहयोग से वेदी तैयार कर विधानपूर्वक विवाह करे, अपने वंश की वृद्धि के लिए। साथ-साथ अपनी विद्या का लाभ देता रहे ऋषि-ऋण चुकाने के लिए ॥२॥