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Rigveda / 10 / 61 / 6

म॒ध्या यत्कर्त्व॒मभ॑वद॒भीके॒ कामं॑ कृण्वा॒ने पि॒तरि॑ युव॒त्याम् । म॒ना॒नग्रेतो॑ जहतुर्वि॒यन्ता॒ सानौ॒ निषि॑क्तं सुकृ॒तस्य॒ योनौ॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 61 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : म॒ध्या । यत् । कर्त्व॑म् । अभ॑वत् । अ॒भीके॑ । काम॑म् । कृ॒ण्वा॒ने । पि॒तरि॑ । यु॒व॒त्याम् । म॒ना॒नक् । रेतः॑ । ज॒ह॒तुः॒ । वि॒ऽयन्ता॑ । सानौ॑ । निऽसि॑क्तम् । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । योनौ॑ ॥ १०.६१.६

पदार्थ : (यत् युवत्यां कर्त्वम्-अभवत्) जब कि युवती भार्या में पुत्रोत्पादन से कर्त्तव्य पूर्ण हो जाता है (पितरि कामं कृण्वाने-अभीके) जीवित पिता में-उसके आश्रय पुत्र का पुत्र उत्पादन की कामना हो जाने पर उसके सम्मुख (वियन्तौ मनानक्-रेतः-जहतुः) विशिष्टता से प्राप्त होते हुए पति पत्नी अल्प सन्तानों को तो त्याग दें-उत्पन्न करें (सुकृतस्य योनौ सानौ निषक्तम्) पुण्यकर्म के अर्थात् पितृ-ऋण के प्रतीकार हो जाने पर गृहाश्रम में विशेष सेवन करने योग्य जगत् में निषेक करना कर्त्तव्य होता है ॥६॥

भावार्थ : युवती भार्या में पुत्रोत्पादन के लिए वीर्यनिषेक करना कर्त्तव्य होता है। जीवित पिता के होते हुए कम से कम प्रजा तो अवश्य उत्पन्न करे। इसके लिए गृहस्थ आश्रम पुण्य का स्थान है। विशेष सेवनीय जगत् में सन्तानपरम्परा के लिए निषेक करना आवश्यक है। यह गृहस्थाश्रम की परम्परा है ॥६॥