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Rigveda / 10 / 61 / 25

यु॒वोर्यदि॑ स॒ख्याया॒स्मे शर्धा॑य॒ स्तोमं॑ जुजु॒षे नम॑स्वान् । वि॒श्वत्र॒ यस्मि॒न्ना गिर॑: समी॒चीः पू॒र्वीव॑ गा॒तुर्दाश॑त्सू॒नृता॑यै ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 61 | Mantra No : 25

In Hindi:

ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यु॒वोः । यदि॑ । स॒ख्याय॑ । अ॒स्मे इति॑ । शर्धा॑य । स्तोम॑म् । जु॒जु॒षे । नम॑स्वान् । वि॒श्वत्र॑ । यस्मि॑न् । आ । गिरः॑ । स॒म्ऽई॒चीः । पू॒र्वीऽइ॑व । गा॒तुः । दाश॑त् । सू॒नृता॑यै ॥ १०.६१.२५

पदार्थ : (युवयोः सख्याय) तुम स्त्री-पुरुषों के मित्रभाव के लिए (अस्मे शर्धाय) हमारे आत्मबलप्राप्ति के लिए (नमस्वान् स्तोमम्) स्तुतिमान् होता हुआ स्तुतिसमूह को (यदि जुजुषे) यदि तू सेवन करता है या स्वीकार करता है, तो (यस्मिन् विश्वत्र) जिस तुझ विश्व की रक्षा करनेवाले में (समीचीः-पूर्वीः-इव गिरः) श्रेष्ठ स्तुतियों को (गातुः-दाशत्) तुझ परमात्मा के प्रति गमनशील उपासक देता है-समर्पित करता है (सूनृतायै) शोभन मुमुक्षु भावना के लिए, जिससे वे सफल होवें ॥२५॥

भावार्थ : उपासक को समस्त स्त्री-पुरुषों के प्रति मित्रभाव रखना चाहिए। इससे परमात्मा स्तुतियों को स्वीकार करता है-अपनाता है तथा उसे मोक्ष प्रदान करता है ॥२५॥