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Rigveda / 10 / 62 / 10

उ॒त दा॒सा प॑रि॒विषे॒ स्मद्दि॑ष्टी॒ गोप॑रीणसा । यदु॑स्तु॒र्वश्च॑ मामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 62 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : नाभानेदिष्ठो मानवः | देवता : सावर्णेर्दानस्तुतिः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : उ॒त । दा॒सा । प॒रि॒ऽविषे॑ । स्मद्दि॑ष्टी॒ इति॒ स्मत्ऽदि॑ष्टी । गोऽप॑रीणसा । यदुः॑ । तु॒र्वः । च॒ । मा॒म॒हे॒ ॥ १०.६२.१०

पदार्थ : (स्मद्दिष्टी) प्रशस्त दर्शनवाले (गोपरीणसा) बहुत गौवोंवाले बहुत विद्या वाणीवाले अध्यापक उपदेशक (दासा) तथा दानी (उत) और (परिविषे) स्नानसेवा के लिये योग्य होओ (यदुः-तुर्वः-च ममहे) यत्नशील और प्रगतिशील जन महत्त्व पाते हैं ॥१०॥

भावार्थ : प्रशस्त दर्शनीय बहुत विद्यावाले अध्यापक उपदेशक ज्ञान के दानियों की स्नानादि सेवा और प्रशंसा करनी चाहिए ॥१०॥