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Rigveda / 10 / 64 / 3

नरा॑ वा॒ शंसं॑ पू॒षण॒मगो॑ह्यम॒ग्निं दे॒वेद्ध॑म॒भ्य॑र्चसे गि॒रा । सूर्या॒मासा॑ च॒न्द्रम॑सा य॒मं दि॒वि त्रि॒तं वात॑मु॒षस॑म॒क्तुम॒श्विना॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 64 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : नरा॒शंस॑म् । वा॒ । पू॒षण॑म् । अगो॑ह्यम् । अ॒ग्निम् । दे॒वऽइ॑द्धम् । अ॒भि । अ॒र्च॒से॒ । गि॒रा । सूर्या॒मासा॑ । च॒न्द्रम॑सा । य॒मम् । दि॒वि । त्रि॒तम् । वात॑म् । उ॒षस॑म् । अ॒क्तुम् । अ॒श्विना॑ ॥ १०.६४.३

पदार्थ : (वा) और (नराशंसम्) मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय (पूषणम्) पोषण करनेवाले (अगोह्यम्-अग्निम्) प्रत्यक्ष करने योग्य अग्निरूप (देवेद्धम्) देवों-विद्वानों द्वारा साक्षात् करने योग्य परमात्मा को (गिरा-अभ्यर्चसे) स्तुति के द्वारा पूजित कर (सूर्यामासा चन्द्रमसा) सूर्य और चन्द्रमारूप ज्ञानप्रकाशक और स्नेहप्रसारक (यमम्) जगन्नियन्ता परमात्मा को (दिवि त्रितम्) मोक्षधाम में वर्तमान तथा तीनों लोकों में व्यापक (वातम्) वायु के समान जीवनप्रद (उषसम्-अक्तुम्) जागृतिप्रद और स्नेहप्रद (अश्विना) ज्योतिर्मय और आनन्दरसमय परमात्मा को पूजित कर ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा समस्त देवों के गुणों से युक्त है। वह मनुष्यों तथा ऋषियों द्वारा स्तुति करने योग्य और साक्षात् करने योग्य है ॥३॥