Rigveda / 10 / 68 / 10
हि॒मेव॑ प॒र्णा मु॑षि॒ता वना॑नि॒ बृह॒स्पति॑नाकृपयद्व॒लो गाः । अ॒ना॒नु॒कृ॒त्यम॑पु॒नश्च॑कार॒ यात्सूर्या॒मासा॑ मि॒थ उ॒च्चरा॑तः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 68 | Mantra No : 10
In English:
Seer : ayaasyaH | Devta : bRRihaspatiH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : himeva parNaa muShitaa vanaani bRRihaspatinaakRRipayadvalo gaaH . anaanukRRityamapunashchakaara yaatsuuryaamaasaa mitha uchcharaataH .
Component Words : himaa.aiva . parNaa . muShitaa . vanaani . bRRihaspatinaa . akRRipayat . valaH . gaaH . ananu.akRRityam . apunariti . chakaara . yaat . suuryaamaasaa . mithaH . ut.acharaataH . 10.68.10
In Hindi:
ऋषि : अयास्यः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : हि॒माऽइ॑व । प॒र्णा । मु॒षि॒ता । वना॑नि । बृह॒स्पति॑ना । अ॒कृ॒प॒य॒त् । व॒लः । गाः । अ॒न॒नु॒ऽकृ॒त्यम् । अ॒पु॒नरिति॑ । च॒का॒र॒ । यात् । सूर्या॒मासा॑ । मि॒थः । उ॒त्ऽचरा॑तः ॥ १०.६८.१०
पदार्थ : (हिमा-इव वनानि) जैसे हेमन्त ऋतु से वन में होनेवाले (पर्णा मुषिता) पत्ते पृथक् किये जाते हैं अर्थात् अलग हो जाते हैं, (बृहस्पतिना) वेद का पालक परमात्मा वैसे (वलः) आवरक अज्ञान से आत्मा को पृथक् करने के लिए (गाः-अकृपयत्) वाणियाँ-विद्याएँ जीवात्माओं के लिए रचता है (यावत्-सूर्यामासा) जब तक सूर्यचन्द्रमा (मिथः-उच्चरातः) आकाश में दिन-रात या दोनों पक्षों में उदय होते हैं-दृष्टिगोचर होते हैं, तब तक (अननुकृत्यम्-अपुनः-चकार) उस वेदज्ञान को, जिसे पुनः-पुनः प्रकट नहीं करता, एक बार ही प्रकट करता है ॥१०॥
भावार्थ : परमात्मा सूर्य और चन्द्रमा को तो दिन-रात में या दोनों पक्षों में बार-बार या पुनः-पुनः उदित करता है, परन्तु जीवात्माओं को अज्ञान से छुड़ाने के लिए वेदवाणियों या वेद के ज्ञान को एक बार ही प्रकट करता है, क्योंकि परमात्मा का ज्ञान पूर्ण है। उसे बार बार प्रकट करने की आवश्यकता नहीं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : अयास्यः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : हि॒माऽइ॑व । प॒र्णा । मु॒षि॒ता । वना॑नि । बृह॒स्पति॑ना । अ॒कृ॒प॒य॒त् । व॒लः । गाः । अ॒न॒नु॒ऽकृ॒त्यम् । अ॒पु॒नरिति॑ । च॒का॒र॒ । यात् । सूर्या॒मासा॑ । मि॒थः । उ॒त्ऽचरा॑तः ॥ १०.६८.१०
भावार्थ :