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Rigveda / 10 / 69 / 3

यत्ते॒ मनु॒र्यदनी॑कं सुमि॒त्रः स॑मी॒धे अ॑ग्ने॒ तदि॒दं नवी॑यः । स रे॒वच्छो॑च॒ स गिरो॑ जुषस्व॒ स वाजं॑ दर्षि॒ स इ॒ह श्रवो॑ धाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 69 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : सुमित्रो वाध्र्यश्चः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यत् । ते॒ । मनुः॑ । यत् । अनी॑कम् । सु॒ऽमि॒त्रः । स॒म्ऽई॒धे । अ॒ग्ने॒ । तत् । इ॒दम् । नवी॑यः । सः । रे॒वत् । शो॒च॒ । सः । गिरः॑ । जु॒ष॒स्व॒ । सः । वाज॑म् । द॒र्षि॒ । सः । इ॒ह । श्रवः॑ । धाः॒ ॥ १०.६९.३

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्रणायक ! (ते) तेरा (यत्-अनीकम्) जो सेनाबल है (मनुः-सुमित्रः) मननशील अच्छा मित्र सहयोगी (समीधे) सम्यक् दीप्त करता है-प्रोत्साहित करता है (तत्-इदं नवीयः) उस सैन्यबल को बहुत प्रशंसनीय तू (रेवत् शोच) ऐश्वर्यवाला प्रसिद्ध कर (सः) वह तू (गिरः-जुषस्व) प्रेरणावचनों को सेवन कर (सः) वह तू (वाजं दर्षि) शत्रुबल को क्षीण कर (सः) वह तू (श्रवः-धाः) यश अथवा अन्न को धारण कर ॥३॥

भावार्थ : जिस राजा के पास सैन्यबल प्रबल होता है और वह उस सैन्यबल को बढ़ाता है, प्रोत्साहित करता है, तो वह उसका साथ देनेवाले मित्र के समान हो जाता है, शत्रु को विदीर्ण करता है, उसके यश को बढ़ाता है ॥३॥