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Rigveda / 10 / 69 / 9

दे॒वाश्चि॑त्ते अ॒मृता॑ जातवेदो महि॒मानं॑ वाध्र्यश्व॒ प्र वो॑चन् । यत्स॒म्पृच्छं॒ मानु॑षी॒र्विश॒ आय॒न्त्वं नृभि॑रजय॒स्त्वावृ॑धेभिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 69 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : सुमित्रो वाध्र्यश्चः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : दे॒वाः । चि॒त् । ते॒ । अ॒मृताः॑ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । म॒हि॒मान॑म् । वा॒धि॒ऽअ॒श्व॒ । प्र । वो॒च॒न् । यत् । स॒म्ऽपृच्छ॑म् । मानु॑षीः । विशः॑ । आय॑न् । त्वम् । नृऽभिः॑ । अ॒ज॒यः॒ । त्वाऽवृ॑धेभिः ॥ १०.६९.९

पदार्थ : (वाध्र्यश्व जातवेदः) हे जितेन्द्रिय पुरुष के उपास्यदेव सर्वज्ञ परमात्मन् ! (अमृताः-देवाः-चित्) जीवन्मुक्त विद्वान् भी तेरे महत्त्व को कहते हैं (यत्-सम्पृच्छम्) इस प्रकार तुझ सम्यक् प्रष्टव्य को (मानुषीः-विशः-आयन्) मनुष्यप्रजाएँ-मननशील स्तुति करनेवाले जब पूछने को आते हैं (नृभिः-त्वा वृधेभिः-त्वम्-अजयः) जीवन्मुक्तों, तुझे अपने अन्दर बढ़ानेवालों द्वारा साक्षात् करने के हेतुओं से उन्हें लक्ष्य करके उनके दोषों को जीतता है और नष्ट करता है॥९।

भावार्थ : परमात्मा जितेन्द्रिय संयमी जन का उपास्य बनता है। जीवन्मुक्त उसके गुणगान गाते हैं, साधारण मनुष्य उसके सम्बन्ध में अनेक प्रश्न करते हैं, वह अपने स्तुतिकर्त्ताओं के दोषों को नष्ट करता है ॥९॥