Rigveda / 1 / 185 / 9
उ॒भा शंसा॒ नर्या॒ माम॑विष्टामु॒भे मामू॒ती अव॑सा सचेताम्। भूरि॑ चिद॒र्यः सु॒दास्त॑राये॒षा मद॑न्त इषयेम देवाः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 185 | Mantra No : 9
In English:
Seer : agastyo maitraavaruNiH | Devta : dyaavaapRRithivyau | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ubhaa sha.msaa naryaa maamaviShTaamubhe maamuutii avasaa sachetaam. bhuuri chidaryaH sudaastaraayeShaa madanta iShayema devaaH .
Component Words : ubhaa. sha.msaa. naryaa. maam. aviShTaam. ubhe iti. maam. uutii iti. avasaa. sachetaam. bhuuri. chit. aryaH. sudaaH.ataraaya. iShaa. madantaH. iShayema. devaaH . 1.185.9
In Hindi:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : उ॒भा। शंसा॑। नर्या॑। माम्। अ॒वि॒ष्टा॒म्। उ॒भे इति॑। माम्। ऊ॒ती इति॑। अव॑सा। स॒चे॒ता॒म्। भूरि॑। चि॒त्। अ॒र्यः। सु॒दाःऽत॑राय। इ॒षा। मद॑न्तः। इ॒ष॒ये॒म॒। दे॒वाः॒ ॥ १.१८५.९
पदार्थ : (उभा) दोनों (शंसा) प्रशंसा को प्राप्त (नर्य्या) मनुष्यों में उत्तम द्यावापृथिवी के समान माता-पिता (माम्) मेरी (अनिष्टाम्) रक्षा करें और (माम्) मुझे (उभे) दोनों (ऊती) रक्षाएँ (अवसा) औरों की रक्षा आदि के साथ (सचेताम्) प्राप्त होवें। हे (देवाः) विद्वानो ! (अर्यः) वणिया (सुदास्तराय) अतीव देनेवाले के लिये (भूरि, चित्) बहुत जैसे देवे वैसे (मदन्तः) सुखी होते हुए हम लोग (इषा) इच्छा से (इषयेम) प्राप्त होवें ॥ ९ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा सबका संयोग कर प्राणियों को सुखी करते हैं तथा जैसे धनाढ्य वैश्य बहुत अन्न आदि पदार्थ देकर भिखारियों को प्रसन्न करता है, वैसे विद्वान् जन सबके प्रसन्न करने में प्रवृत्त होवें ॥ ९ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : उ॒भा। शंसा॑। नर्या॑। माम्। अ॒वि॒ष्टा॒म्। उ॒भे इति॑। माम्। ऊ॒ती इति॑। अव॑सा। स॒चे॒ता॒म्। भूरि॑। चि॒त्। अ॒र्यः। सु॒दाःऽत॑राय। इ॒षा। मद॑न्तः। इ॒ष॒ये॒म॒। दे॒वाः॒ ॥ १.१८५.९
पदार्थ : (उभा) उभौ (शंसा) प्रशंसितौ (नर्य्या) नृषु साधु (माम्) (अविष्टाम्) रक्षतम् (उभे) (माम्) (ऊती) व्यवहारविद्यारक्षे (अवसा) रक्षादिना (सचेताम्) प्राप्नुताम् (भूरि) बहु (चित्) इव (अर्यः) वणिग्जनः (सुदास्तराय) अतिशयेन दात्रे (इषा) इच्छया (मदन्तः) सुखयन्तः (इषयेम) प्राप्नुयाम (देवाः) विद्वांसः ॥ ९ ॥
अन्वय : उभा शंसा नर्य्या द्यावापृथिवीव मातापितरौ मामविष्टां मामुभे ऊती अवसा सचेताम्। हे देवा अर्य्यः सुदास्तराय भूरि चिन्मदन्तो वयमिषेषयेम ॥ ९ ॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्याचन्द्रमसौ सर्वं संयुज्य प्राणिनः सुखयतः। यथार्थधनाढ्यो वैश्यो बह्वन्नादिकं दत्वा भिक्षुकान् प्रीणाति तथा विद्वांसः सर्वेषां प्रीणने प्रवर्त्तेरन् ॥ ९ ॥