Rigveda / 10 / 76 / 2
तदु॒ श्रेष्ठं॒ सव॑नं सुनोत॒नात्यो॒ न हस्त॑यतो॒ अद्रि॑: सो॒तरि॑ । वि॒दद्ध्य१॒॑र्यो अ॒भिभू॑ति॒ पौंस्यं॑ म॒हो रा॒ये चि॑त्तरुते॒ यदर्व॑तः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 76 | Mantra No : 2
In English:
Seer : jaratkarNa airaavataH sarpaH | Devta : graavaaNaH | Metre : svaraaDaarchiijagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tadu shreShTha.m savana.m sunotanaatyo na hastayato adriH sotari . vidaddhya1ryo abhibhuuti pau.msya.m maho raaye chittarute yadarvataH .
Component Words : tat . uu.N iti . shreShTham . savanam . sunotana . atyaH . na . hasta.ayataH . adriH . sotari . vidat . hi . aryaH . abhi.abhuuti . pau.msyam . mahaH . raaye . chit . tarute . yat . arvataH . 10.76.2
In Hindi:
ऋषि : जरत्कर्ण ऐरावतः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : तत् । ऊँ॒ इति॑ । श्रेष्ठ॑म् । सव॑नम् । सु॒नो॒त॒न॒ । अत्यः॑ । न । हस्त॑ऽयतः । अद्रिः॑ । सो॒तरि॑ । वि॒दत् । हि । अ॒र्यः । अ॒भिऽभू॑ति । पौंस्य॑म् । म॒हः । रा॒ये । चि॒त् । त॒रु॒ते॒ । यत् । अर्व॑तः ॥ १०.७६.२
पदार्थ : (तत्-उ) उस (श्रेष्ठं सवनम्) श्रेष्ठ अवसर को (सुनोतन) सम्पन्न करो, (हस्तयतः) हाथों में नियन्त्रित (अत्यः-न) घोड़े के समान-जैसे घोड़ा होता है (सोतरि) प्रेरयिता परमात्मा में (अद्रिः) मैं प्रशंसक होऊँ (अर्यः) वह स्वामी परमात्मा (अभिभूति पौंस्यम्) अभिभवकारी पौरुष-आत्मबल को (विदत्) प्राप्त करावे (यत्-अर्वतः) प्राप्तव्य या प्राप्त पदार्थों को (तरुते) प्रदान करता है-बढ़ाता है ॥२॥
भावार्थ : परमात्मा की स्तुति में इतना बँध जाऊँ, जैसे घोड़ा बँध जाता है, इस ऐसे श्रेष्ठ अवसर को हम बनावें, वह स्वामी परमात्मा आत्मबल प्रदान करे, जिससे कि प्राप्तव्य पदार्थों को हम प्राप्त कर सकें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : जरत्कर्ण ऐरावतः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : तत् । ऊँ॒ इति॑ । श्रेष्ठ॑म् । सव॑नम् । सु॒नो॒त॒न॒ । अत्यः॑ । न । हस्त॑ऽयतः । अद्रिः॑ । सो॒तरि॑ । वि॒दत् । हि । अ॒र्यः । अ॒भिऽभू॑ति । पौंस्य॑म् । म॒हः । रा॒ये । चि॒त् । त॒रु॒ते॒ । यत् । अर्व॑तः ॥ १०.७६.२
भावार्थ :