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Rigveda / 1 / 186 / 3

प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं गृणीषे॒ऽग्निं श॒स्तिभि॑स्तु॒र्वणि॑: स॒जोषा॑:। अस॒द्यथा॑ नो॒ वरु॑णः सुकी॒र्तिरिष॑श्च पर्षदरिगू॒र्तः सू॒रिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 186 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : प्रेष्ठ॑म्। वः॒। अति॑थिम्। गृ॒णी॒षे॒। अ॒ग्निम्। श॒स्तिऽभिः॑। तु॒र्वणिः॑। स॒ऽजोषाः॑। अस॑त्। यथा॑। नः॒। वरु॑णः। सु॒ऽकी॒र्तिः। इषः॑। च॒। प॒र्ष॒त्। अ॒रि॒ऽगू॒र्तः। सू॒रिः ॥ १.१८६.३

पदार्थ : हे विद्वान् ! जैसे (तुर्वणिः) शीघ्र जाने और (सजोषाः) समान प्रीति रखनेवाले आप (शस्तिभिः) प्रशंसाओं से (अग्निम्) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्या से प्रकाशित (प्रेष्ठम्) अतिप्रिय (अतिथिम्) अतिथिवद्वर्त्तमान विद्वान की (गृणीषे) प्रशंसा करते हो वा (यथा) जैसे (अरिगूर्त्तः) शत्रुओं में उद्यम करने और (सुकीर्त्तिः) पुण्य प्रशंसावाला (वरुणः) उत्तम विद्वान् (नः) हम लोगों को (इषः) अन्नादि पदार्थ (च) और इच्छाओं को (पर्षत्) सीचें वा (सूरिः) अतीव प्रवीण विद्वान् (असत्) हों वैसे (वः) तुम लोगों के प्रति वर्त्ते ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो गृहस्थजन प्रीति के साथ श्रेष्ठ, उत्तम शास्त्रज्ञ विद्वानों और अतिथि की सेवा करते हैं, धर्मयुक्त व्यवहार में उद्योगवान् होते वे यथार्थ विज्ञान को पाकर श्रीमान् होते हैं ॥ ३ ॥