Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 79 / 3

प्र मा॒तुः प्र॑त॒रं गुह्य॑मि॒च्छन्कु॑मा॒रो न वी॒रुध॑: सर्पदु॒र्वीः । स॒सं न प॒क्वम॑विदच्छु॒चन्तं॑ रिरि॒ह्वांसं॑ रि॒प उ॒पस्थे॑ अ॒न्तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 79 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अग्निः सौचीको, वैश्वानरो वा, सप्तिर्वा वाजम्भरः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । मा॒तुः । प्र॒ऽत॒रम् । गुह्य॑म् । इ॒च्छन् । कु॒मा॒रः । न । वी॒रुधः॑ । स॒र्प॒त् । उ॒र्वीः । स॒मम् । न । प॒क्वम् । अ॒वि॒द॒त् । शु॒चन्त॑म् । रि॒रि॒ह्वांस॑म् । रि॒पः । उ॒पऽस्थे॑ । अ॒न्तरिति॑ ॥ १०.७९.३

पदार्थ : (मातुः) उस माता परमात्मा के (प्रतरम्) प्रकृष्टतर-अत्युत्तम (गुह्यम्) गुप्त मोक्ष धाम को (इच्छन्) चाहता हुआ उपासक आत्मा (कुमारः-न) बालक के समान (उर्वीः-वीरुधः) बहुविध रचनविशेष से कार्य-कारण द्रव्यों की विरोहण करने योग्य भूमियों को (प्रसर्पत्) प्राप्त होता है (पक्वं शुचन्तम्) पके हुए शुभ्र (ससं न) अन्न की भाँति कर्मफल को (रिरिह्वांसम्) आस्वादन करते हुए को (रिपः-उपस्थे अन्ते) शरीरस्थान के अन्तर्गत (अविदत्) प्राप्त होता है ॥३॥

भावार्थ : उपासक आत्मा माता परमात्मा के आनन्दधाम मोक्ष का आस्वादन करने के लिए ऐसे प्राप्त होता है, जैसे कोई बालक कर्मानुसार युवति माता के आश्रय में सुखों को प्राप्त करता है ॥३॥