Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 80 / 4

अ॒ग्निर्दा॒द्द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा अ॒ग्निॠषिं॒ यः स॒हस्रा॑ स॒नोति॑ । अ॒ग्निर्दि॒वि ह॒व्यमा त॑ताना॒ग्नेर्धामा॑नि॒ विभृ॑ता पुरु॒त्रा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 80 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अग्निः सौचीको वैश्वानरो वा | देवता : अग्निः | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒ग्निः । दा॒त् । द्रवि॑णम् । वी॒रऽपे॑शाः । अ॒ग्निः । ऋषि॑म् । यः । स॒हस्रा॑ । स॒नोति॑ । अ॒ग्निः । दि॒वि । ह॒व्यम् । आ । त॒ता॒न॒ । अ॒ग्नेः । धामा॑नि । विऽभृ॑ता । पु॒रु॒ऽत्रा ॥ १०.८०.४

पदार्थ : (वीरपेशाः-अग्निः-ह) वीरस्वरूप परमात्मा निश्चय (ऋषिं द्रविणं दात्) अपने द्रष्टा के लिए मौक्षैश्वर्य देता है (यः सहस्रा सनोति) जो बहुत स्तुतिवचनों को उसके लिए समर्पित करता है (अग्निः) परमात्मा (दिवि) मोक्षधाम में (हव्यं आततान) स्तुतिवचनों का विस्तार करता है (अग्नेः-धामानि) परमात्मा के व्याप्त धाम (पुरुत्रा विभृता) बहुत नियत हैं ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा अपने द्रष्टा-दर्शन के इच्छुक के लिए मौक्षैश्वर्य देता है, जो उसके लिए बहुत सुखी वचनों को समर्पित करता है, उन स्तुतियों का विस्तृत फल मोक्षप्राप्ति है ॥४॥