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Rigveda / 1 / 186 / 7

उ॒त न॑ ईं म॒तयोऽश्व॑योगा॒: शिशुं॒ न गाव॒स्तरु॑णं रिहन्ति। तमीं॒ गिरो॒ जन॑यो॒ न पत्नी॑: सुर॒भिष्ट॑मं न॒रां न॑सन्त ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 186 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर और दृष्टान्त से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उ॒त। नः॒। ई॒म्। म॒तयः॑। अश्व॑ऽयोगाः। शिशु॑म्। न। गावः॑। तरु॑णम्। रि॒ह॒न्ति॒। तम्। ई॒म्। गिरः॑। जन॑यः। न। पत्नीः॑। सु॒र॒भिःऽत॑मम्। न॒राम्। न॒स॒न्त॒ ॥ १.१८६.७

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अश्वयोगाः) अश्वयोग अर्थात् अश्वों का योग कराते हैं वे (मतयः) मनुष्य (तरुणम्) तरुण (शिशुम्) बछड़ों को (न) जैसे (गावः) गौयें वैसे (नः) हम लोगों को (ईम्) सब ओर से (रिहन्ति) प्राप्त होते हैं, जिस (नराम्) मनुष्यों के बीच (सुरभिष्टमम्) अतिशय करके सुगन्धित सुन्दर कीर्त्तिमान् को (जनयः) उत्पत्ति करानेवाले जन (पत्नीः) अपनी पत्नियों को जैसे (न) वैसे (नसन्त) प्राप्त होवें वह (ईम्) सब ओर से (गिरः) वाणियों को प्राप्त होता है (तम्) उसको (उत) ही हम लोग सेवें ॥ ७ ॥

भावार्थ : जैसे घुड़चढ़ा शीघ्र एकस्थान से दूसरे स्थान को वा जे गौयें बछड़ों को वा स्त्रीव्रत जन अपनी अपनी पत्नियों को प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन विद्या और श्रेष्ठ विद्वानों की वाणियों को प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥