Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 82 / 7

न तं वि॑दाथ॒ य इ॒मा ज॒जाना॒न्यद्यु॒ष्माक॒मन्त॑रं बभूव । नी॒हा॒रेण॒ प्रावृ॑ता॒ जल्प्या॑ चासु॒तृप॑ उक्थ॒शास॑श्चरन्ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 82 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : विश्वकर्मा भौवनः | देवता : विश्वकर्मा | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : न । तम् । वि॒दा॒थ॒ । यः । इ॒मा । ज॒जान॑ । अ॒न्यत् । यु॒ष्माक॑म् । अन्त॑रम् । ब॒भू॒व॒ । नी॒हा॒रेण॑ । प्रावृ॑ताः । जल्प्या॑ । च॒ । अ॒सु॒ऽतृपः॑ । उ॒क्थ॒ऽशासः॑ । च॒र॒न्ति॒ ॥ १०.८२.७

पदार्थ : (यः-इमा जजान) जो परमात्मा इन लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है (तं न विदाथ) उसको नहीं जानते हो (युष्माकम्) तुम्हारे अन्दर (अन्यत्-अन्तरम्) भिन्न भेदक छिद्र (बभूव) है (नीहारेण) अज्ञानान्धकार से (प्रावृताः) बहुत आच्छादित हो, तथा (जल्प्या च) इधर-उधर जल्पना से-इधर-उधर भाषण से वाक्संयमरहितता से (असुतृपः) प्राणपोषक-स्वार्थपरायण-विषयपरायण (उक्थशासः) कथनमात्र-प्रशंसक (चरन्ति) मनुष्य विचरण करते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है ॥७॥

भावार्थ : जिस परमात्मा ने सब लोक-लोकान्तरों को रचा है, उसको नहीं जानते हैं-नहीं स्मरण करते हैं, इसलिए कि मनुष्य के अन्दर दोष हैं, अज्ञानान्धकार तथा वासना का कुहरा, अन्यथा जल्पना, असंयत वाणी से मिथ्यास्तुति प्रशंसा किया करते हैं ॥७॥