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Rigveda / 1 / 186 / 9

प्र नु यदे॑षां महि॒ना चि॑कि॒त्रे प्र यु॑ञ्जते प्र॒युज॒स्ते सु॑वृ॒क्ति। अध॒ यदे॑षां सु॒दिने॒ न शरु॒र्विश्व॒मेरि॑णं प्रुषा॒यन्त॒ सेना॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 186 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : प्र। नु। यत्। ए॒षा॒म्। म॒हि॒ना। चि॒कि॒त्रे। प्र। यु॒ञ्ज॒ते॒। प्र॒ऽयुजः॑। ते। सु॒ऽवृ॒क्ति। अध॑। यत्। ए॒षा॒म्। सु॒ऽदिने॑। न। शरुः॑। विश्व॑म्। आ। इरि॑णम्। प्रु॒षा॒यन्त॑। सेनाः॑ ॥ १.१८६.९

पदार्थ : (यत्) जो (एषाम्) इन विद्वानों के (महिम्ना) महिमा से (प्र, चिकित्रे) उत्तमता से विशेष ज्ञानवान् विद्वान् के लिये (प्रयुजः) उत्तमता से योग करते उनको (नु) शीघ्र (प्रयुञ्जन्ते) अच्छे प्रकार युक्त करते हैं (अध) इसके अनन्तर (यत्) जो जन (एषाम्) इन अच्छे योग करनेवालों के (सुदिने) उत्तम समय में (विश्वम्) समस्त (इरिणम्) कंपायमान जगत् को (शरुः) मारनेवाला वीर जन (सेनाः) सेनाओं को जैसे (न) वैसे (आ, प्रुषायन्त) सेवन करें (ते) वे (सुवृक्ति) सुन्दर गमन जिसमें हो उस उत्तम सुख वा मार्ग को प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजजन पूरी विद्यावाले अध्यापकों को विद्याप्रचार के लिये प्रवृत्त करते हैं, वे महिमा—बड़ाई को प्राप्त होते हैं। जो किये को जाननेवाले कुलीन शूरवीरों की सेनाओं को पुष्ट करते, वे सदा विजय को प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥