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Rigveda / 10 / 86 / 18

अ॒यमि॑न्द्र वृ॒षाक॑पि॒: पर॑स्वन्तं ह॒तं वि॑दत् । अ॒सिं सू॒नां नवं॑ च॒रुमादेध॒स्यान॒ आचि॑तं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 86 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : वृषाकपिरैन्द्र इन्द्राणीन्द्रश्च | देवता : वरुणः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒षाक॑पिः । पर॑स्वन्तम् ह॒तम् । वि॒द॒त् । अ॒सिम् । सू॒नाम् । नव॑म् । च॒रुम् । आत् । एध॑स्य । अनः॑ । आऽचि॑तम् । विश्व॑स्मात् । इन्द्रः॑ । उत्ऽत॑रः ॥ १०.८६.१८

पदार्थ : फिर ज्योतिष विषय प्रारम्भ होता है−(इन्द्र) हे उत्तरध्रुव ! (अयं वृषाकपिः) यह वृषाकपि-सूर्य (परस्वन्तं हतं विदत्) वराहयु-वन्य कुत्ते को मार सका (असिम्) काटनेवाले शस्त्र तलवार को (सूनाम्) वधस्थान को (नवं चरुम्) प्रत्यग्र विषयुक्त अन्न को (आत्) अनन्तर और (एधस्य-आचितम्-अनः) जलाने के लिये ईंधन के भरे शकट-छकड़े को इन हत्या के साधनों को अपने अधीन कर लिया, न मर पाया, यह आश्चर्य है ॥१८॥

भावार्थ : आलङ्कारिक ढंग में कहा जाता है कि जितने मारने के साधन हैं शस्त्र, बन्धन, विष, आग में जलना, ये व्यर्थ हो जाते हैं, जिसका कोई अपराध नहीं होता, उसके लिये ऐसा यहाँ दर्शाया गया है ॥१८॥